1000+ Allama iqbal shayari Hindi and Urdu

Allama iqbal shayari


अगर आप ने shayari को पढ़ा है तो आप अल्लामा इक़बाल को जरूर जानते होंगे | अगर आप अल्लामा इक़बाल को नहीं जानते तो हकीकत में आपने शायरी का मतलब ही नहीं जाना। अल्लामा इक़बाल को शायरी का बादशाह माना जाता है यहाँ तक की लोग ये भी कहते है की अल्लामा इक़बाल की शायरी आप किसी भी दौर में पड़ोगे तो आप को ऐसा लगेगा की शायरी इसी दौर की लिखी होइ है।  तो में आपको पहले अल्लामा इक़बाल के बारे में कुछ ज्ञान दे देता हूँ जिससे आपको शायरी पड़ने में एक अलग ही मज़ा आएगा 




मुहम्मद इक़बाल की पैदाइश 9 नवम्बर 1977 में होइ थी अविभाजित भारत के प्रसिद्ध कवि, नेता और दार्शनिक थे। उर्दू और फ़ारसी में इनकी शायरी को आधुनिक काल की सर्वश्रेष्ठ शायरी में गिना जाता है। इक़बाल ने हिन्दोस्तान की आज़ादी से पहले "तराना-ए-हिन्द" लिखा था, जिसके प्रारंभिक बोल- "सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा" कुछ इस तरह से थे। उस समय वो इस सामूहिक देशभक्ति गीत से अविभाजित हिंदुस्तान के लोगों को एक रहने की नसीहत देते थे और और वो इस गीत के कुछ अंश में सभी धर्मों के लोगों को 'हिंदी है हम वतन है' कहकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद की प्रेरणा देते है। 




यू तो शेरो-शायरी के असल मायने महबूब से इश्क के इकरार और तकरार से है, लेकिन इकबाल इन सभी से बेहद आगे हैं। वो अपने शेरों में सिर्फ माशूका की खूबसूरती, उसकी जुल्फें, उसके यौवन की बात नहीं करते बल्कि उनके शेरों में मजलूमों का दर्द भी नजर आता।

 



कौन रखेगा  याद हमें इस दौर ए  खुदगर्जी में,

  हालत ऐसी है की लोगों को खुदा याद नहीं



Kaun rakhega yaad hume is daure khudgarzi mein,

 Haalat aisi hai ki logon ko khuda yaad nahi

 

 

 

 खुदी को कर बुलंद इतना की है तकदीर से पहले,

  खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है'

 

 

 ‘Khudi ko kar buland itna ki hai taqdir se pahle, 

 khuda bande se khud puchhe bata teri raza kya hai’

 

 

 

 अमाल  से जिंदगी बनती है जन्नत भी जहानम भी,

  ये खाकी अपनी फितरत में न नूरी हा ना नारी है'

  

 

 ‘Amal se zindagi banti hai jannat bhi jahannam bhi, 

 yeh khaki apni fitrat men na nuuri ha na naari hai’

 

 

 

 'दिल से जो बात निकलती है असर रहती है,

  पर नहीं तकत-ए-परवाज़ मगर रखती है'

  

  

 

 ‘Dil se jo baat nikalti hai asar rakhti hai, 

 par nahin taqat-e-parvaz magar rakhti hai’

 

 

allama iqbal shayari in urdu

 

 जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही

खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही




jab ishq sikhaata hai aadaab-e-khud-aagaahi

khulate hain gulaamon par asaraar-e-shahanshahi



अजीब ज़ुल्म हुई हैं दुनिया में मोहब्बत पर

जिन्हे मिली उन्हे कदर नहीं जिन्हे कदर थी उने मिली नहीं।




Ajeeb Zulm Hain Duniya Mein Mohabbat par 

Jinhe mili Unhe Qadar Nahi Jinhe Qadar Thi Unte mili Nahi.



ना मेरा दिल बुरा था ना उसमे कोई बुराई थी 

सब मुकद्दर का खेल था

क़िस्मत में ही जुदाई थी।



Na Mera Dil Bura Tha Na Usme Koi Burai Thi 

Sab Muqaddar ka Khel Tha

Qismat Mein hi Judai Thi.




जिंदा रहना है तो हलात से डरना केसा इकबाल

जंग लाजिम हो तो लश्कर नहीं देखे जाते।




Zinda Rehna Hai To Halaat Se

Darna Kesa IQBAL

Jang laazim Ho To Lashkar Nahi

Dekhe Jaate.




कौन यह कहता है खुदा नजर नहीं आता

वही तो नजर आता है जब कुछ नजर नहीं आता



Kaun ye kehta hai, khuda nazar nahi aata

Wahi to nazar aata hai, jab kuch nazar nahi aata


देखे हैं हमने अहराम में लिपटे हुए इब्लीस

हमने कई बार मैं खाने में खुदा देखा है


Dekhe hai hum ne ehraam mein lipte huwe iblees

Hum ne, kai baar maikhane mein, khuda dekha hai


ठिकाना कब्र है कुछ तो इबादत कर इकबाल

रीबायात है कि किसी के घर खाली हाथ नहीं जाते


Thikana qabar hai kuch to ibaadat kar Iqbal

Riwayat hai ke, kisi ke ghar khali hath nahi  jaate


लोग पत्थर मारने आए तो वह भी साथ थे इकबाल

जिनके गुनाह कभी हम अपने सर लिया करते थे



Log patthar maarne aaye to wo bhi saath the Iqbal

Jin ke gunah kabhi hum apne sar liye karte the


दिल में खुदा का होना लाजिम है इकबाल

सजदों में पड़े रहने से जन्नत नहीं मिलती



Dil mein khuda ka hona laazim hai Iqbal

Sajdon mein pade rehne se Jannat nahi milti



खामोश ए दिल भारी महफिल में चिल्लाना अच्छा नहीं होता

 अदब पहला करीना है मोहब्बत के करीनो में



Khamosh ae dil! Bhari mehfil mein chillana nahi accha

Adab pehla qareena hai, mohabbat ke qareenon mein


मुकाम-ए-अक्ल से आसान गुजर गया इकबाल

मुकाम-ए-शौक में खोया गया वो फरजाना


Muqaam-e-aqal se aasan guzar gaya Iqbal

Muqaam-e-shauq mein khoya gaya wo farzaana 


कोई इबादत की चाह में रोया

कोई इबादत की रहा में रोया

अजीब है यह नमाज ए मोहब्बत के सिलसिले इकबाल

कोई कजा करके रोया कोई अदा करके रोया




Koi ibaadat ki chah mein roya,

koi ibaadat ki raah mein roya

Ajeeb hai ye namaaz-e-mohabbat ki silsile Iqbal,

Koi khaza kar ke roya, koi ada kar ke roya



Sikhwa Shayari 



क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ 

फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ 

साज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हम 

नाला आता है अगर लब पे तो माज़ूर हैं हम 



kyoon zayaan-kaar banoon sood-faraamosh rahoon

 fikr-e-farda na karoon mahav-e-gam-e-dosh rahoon

  saaz khaamosh hain fariyaad se maamoor hain ham 

  naala aata hai agar lab pe to maazoor hain ham

  

  

  




हम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़र 

कहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं माबूद शजर 

ख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़र 

मानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकर 

तुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिरा 

क़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिरा 




ham se pahale tha ajab tere jahaan ka manzar 

kaheen masjood the patthar kaheen maabood shajar 

khoogar-e-paikar-e-mahasoos thee insaan kee nazar 

maanata phir koee an-dekhe khuda ko kyoonkar 

tujh ko maaloom hai leta tha koee naam tira 

quvvat-e-baazoo-e-muslim ne kiya kaam tira





हम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिए 

और मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिए 




ham jo jeete the to jangon kee museebat ke lie 

aur marate the tire naam kee azmat ke lie






एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़ 

न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़ 




ek hee saf mein khade ho gae mahamood o ayaaz

 na koee banda raha aur na koee banda-navaaz





सफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम ने 

नौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम ने 


तेरे काबे को जबीनों से बसाया हम ने 

तेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम ने 


फिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहीं 

हम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहीं 


उम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैं 

इज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैं 


उन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैं 

सैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैं 


रहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों पर 

बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलामानों per


allama iqbal shayari hindi


safha-e-dahar se baatil ko mitaaya ham ne 

nau-e-insaan ko gulaamee se chhudaaya ham ne 


tere kaabe ko jabeenon se basaaya ham ne 

tere quraan ko seenon se lagaaya ham ne 


phir bhee ham se ye gila hai ki vafaadaar nahin 

ham vafaadaar nahin too bhee to diladaar nahin 



ummaten aur bhee hain un mein gunahagaar bhee hain 

ijz vaale bhee hain mast-e-may-e-pindaar bhee hain 



un mein kaahil bhee hain gaafil bhee hain hushyaar bhee hain 

saikadon hain ki tire naam se be-zaar bhee hain 



rahamaten hain tiree agyaar ke kaashaanon par 

barq giratee hai to bechaare musalaamaanon par





क्यूँ मुसलामानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाब 

तेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाब 



kyoon musalaamaanon mein hai daulat-e-duniya naayaab 

teree qudarat to hai vo jis kee na had hai na hisaab





है बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हम 

क़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हम 



hai baja sheva-e-tasleem mein mashahoor hain ham 

qissa-e-dard sunaate hain ki majaboor hain ham





Jawab e sikhwa shayari



दिल से जो बात निकलती है असर रखती है

पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है


dil se jo baat nikalatee hai asar rakhatee hai 

par nahin taaqat-e-paravaaz magar rakhatee hai





नाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों को

बात करने का सलीक़ा नहीं नादानों को



naaz hai taaqat-e-guftaar pe insaanon ko 

baat karane ka saleeqa nahin naadaanon ko





आई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिरा 

अश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिरा 


aaee aavaaz gam-angez hai afsaana tira 

ashk-e-betaab se labarez hai paimaana tira




जिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम हो 

नहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम हो 

बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम हो 

बेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम हो



jin ko aata nahin duniya mein koee fan tum ho 

nahin jis qaum ko parava-e-nasheman tum ho 

bijaliyaan jis mein hon aasooda vo khirman tum ho 

bech khaate hain jo aslaaf ke madafan tum ho






सफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस ने 

नौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस ने 

मेरे काबे को जबीनों से बसाया किस ने 

मेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस ने 

थे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या हो 

हाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा हो 




safha-e-dahar se baatil ko mitaaya kis ne 

nau-e-insaan ko gulaamee se chhudaaya kis ne 

mere kaabe ko jabeenon se basaaya kis ne 

mere quraan ko seenon se lagaaya kis ne 

the to aaba vo tumhaare hee magar tum kya ho 

haath par haath dhare muntazir-e-farda ho






एक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एक 

हरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एक 

कुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एक 

फ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं 

क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं 




ek hee sab ka nabee deen bhee eemaan bhee ek 

haram-e-paak bhee allaah bhee quraan bhee ek

kuchh badee baat thee hote jo musalamaan bhee ek 

firaqa-bandee hai kaheen aur kaheen zaaten hain

kya zamaane mein panapane kee yahee baaten hain






जा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीब 

ज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीब 

नाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीब 

पर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीब 





ja ke hote hain masaajid mein saf-aara to gareeb 

zahamat-e-roza jo karate hain gavaara to gareeb 

naam leta hai agar koee hamaara to gareeb 

parda rakhata hai agar koee tumhaara to gareeb




वज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूद 

ये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूद



vaz mein tum ho nasaara to tamaddun mein hunood 

ye musalamaan hain jinhen dekh ke sharamaen yahood




यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो 

तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो 




yoon to sayyad bhee ho mirza bhee ho afgaan bhee ho 

tum sabhee kuchh ho batao to musalamaan bhee ho




हर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर था 

उस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर था 

जो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर था 

है तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर था 

बाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर हो 

फिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर हो 




har musalamaan rag-e-baatil ke lie nashtar tha 

us ke aaeena-e-hastee mein amal jauhar tha 

jo bharosa tha use quvvat-e-baazoo par tha 

hai tumhen maut ka dar us ko khuda ka dar tha 

baap ka ilm na bete ko agar azabar ho 

phir pisar qaabil-e-meeraas-e-pidar kyoonkar ho





हर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी है 

तुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी है



har koee mast-e-may-e-zauq-e-tan-aasaanee hai 

tum musalamaan ho ye andaaz-e-musalamaanee hai





वो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो कर 

और तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो कर 




vo zamaane mein muazziz the musalamaan ho kar 

aur tum khvaar hue taarik-e-quraan ho kar





इन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद किया 

ला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद किया 




in ko tahazeeb ne har band se aazaad kiya 

la ke kaabe se sanam-khaane mein aabaad kiya



आज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदा 

आग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदा 



aaj bhee ho jo braaheem ka eemaan paida 

aag kar sakatee hai andaaz-e-gulistaan paida





पासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने से 

कश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू है 




paasabaan mil gae kaabe ko sanam-khaane se 

kashtee-e-haq ka zamaane mein sahaara too hai




हो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न हो 

चमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न हो 

ये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न हो 

बज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न हो 



ho na ye phool to bulabul ka tarannum bhee na ho 

chaman-e-dahr mein kaliyon ka tabassum bhee na ho 

ye na saaqee ho to phir may bhee na ho khum bhee na ho 

bazm-e-tauheed bhee duniya mein na ho tum bhee na ho





की मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैं 

ये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं 





kee mohammad se vafa too ne to ham tere hain 

ye jahaan cheez hai kya lauh-o-qalam tere hain






कितनी अजीब है गुनाहों की जुस्तजू इकबाल

नमाज भी जल्दी में पड़ता है फिर से गुनाह करने के लिए



Kitni ajeeb hai gunaahon ki justaju Iqbal

Namaaz bhi jaldi mein padte hai phir se gunah karne ke liye




दबा की तलाश में रहा दुआ को छोड़कर

मैं चल ना सका दुनिया में खताओं को छोड़कर


Dawa ki talaash mein raha, dua ko chod kar

Main chal na saka duniya mein, khataon ko chod kar



ना कलाम याद आता है ना दिल लगता है नमाजो में इकबाल

काफिर बना दिया है लोगों को 2 दिन की मोहब्बत ने


Na kalma yaad aata hai na dil lagta hai namaazon mein Iqbal

Kafir bana diya hai logon ko, do din ki mohabbat ne







दिल की इमारतों में कहीं बंदगी नहीं

पत्थरों की मस्जिदों में खुदा ढूंढते हैं लोग


Dil ki imaaraton mein kahin bandagi nahi

Patther ki masjidon mein khuda dhunte hai log





क्यों मिन्नतें मांगता है औरों के दरबार से इकबाल

बो कौन सा काम है जो होता नहीं तेरे परवरदिगार से


Kyun minnatein maangta hai auron ke darbaar se Iqbaal

Wo kaun sa kaam hai, jo hota nahi tere parwardigaar se


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जमीर जाग ही जाता है अगर जिंदा हो इकबाल

कभी गुनाह से पहले तो कभी गुनाह के बाद



Zameer jag hi jata hai, agar zinda ho Iqbal

Kabhi gunah se pehle, to kabhi gunah ke baad





एक मुद्दत के बाद हमने यह जाना ए खुदा

इश्क तेरी जात से सच्चा है बाकी सब अफसाने




Aik muddat ke baad humne ye jaana ae khuda

Ishq teri zaat se saccha hai, baaqi sab afsaaney


मंजिल से आगे बढ़कर मंजिल तलाश कर

मिल जाए तुझको दरिया तो समंदर तलाश कर




Manzil se aage badh kar manzil talaash kar

Mil jaaye tujh ko darya to samandar talaash kar


 हर शीशा टूट जाता है पत्थर की चोट से

पत्थर ही टूट जाए वह शीशा तलाश कर



Har sheesha toot jaata hai, patthar ki chot se

Patthar hi toot jaaye wo sheesha talaash kar



सजदो से तेरा क्या हुआ सदियां गुजर गई

दुनिया तेरी बदल दे वह सजदा तलाश कर


Sajdon se tera kya huwa, sadiyan guzar gayein

Duniya teri badal de wo sajda talaash kar




तस्कीन ना हो जिसमें वह राज बदल डालो

जो राज ना रख पाए वोहत हमराज बदल डालो


Taskeen  na ho jis mein, wo raaz badal daalo

Jo raaz na rakh paaye, humraaz badal daalo


हमने भी सुनी होगी बड़ी आम कहावत है

अंजाम का हो खतरा आगाज बदल डालो


Tum ne bhi suni hogi, badi aam kahaawat hai

Anjaam ka ho khatra, aaghaaz  badal daalo




दुश्मन के इरादों को है जाहिर अगर करना

तुम खेल वहीं खेलो अंदाज बदल डालो


Dushman ke iraadon ko hain zaahir agar karna

Tum khel wahi khelo, andaaz badal daalo


ए दोस्त करो हिम्मत कुछ दूर सवेरा है

अगर चाहते हो मंजिल तो परवाज़ बदल डालो


Aye dost karo himmat kuch door sawera hai

Agar chahte ho mazil, to parwaaz (udaan) badal dalo


हैरान हूं मैं अपनी हसरतों पे इकबाल

हर चीज खुदा से मांग ली मगर खुदा को छोड़कर


Hairaan hoon main, apni hasraton pe Iqbal

Har cheez khuda se maang li, magar khuda ko chod kar


अपने मतलब के अलावा कौन किसको पूछता है

शजर जब सूख जाए तो परिंदे भी बसेरा नहीं करते


Apne matlab ke alawa kaun kisko poochta hai

Shajar jab sookh jaye, to parindey bhi basera nahi karte


ईमान तेरा लूट गया रहजान के हाथों से

ईमान तेरा बचाले वह रहकर तलाश कर



Imaan tera lut gaya rehzan (robber) ke haathon se

Imaan tera bacha le, wo rahbar (rehnuma) talaash kar


करे सब्र ऊंट पे अपने गुलाम को

पैदल ही खुद चले वोह आका तलाश कर




Kare sawar oont (camel) pe apne gulaam ko

Paidal hi khud chale, wo aaqa talaash kar




बात सजदे की नहीं खालिस-ए-निय्यत की होती है इकबाल

अक्सर लोग खाली हाथ लौट आते हैं हर नमाज के बाद


Baat sajdah ki nahi, khalis-e-niyyat ki hoti hai Iqbal

Aksar log khali haath laut aate hain har namaaz ke baad




दुनिया की महफिलों से घबरा गया हूं या रब

क्या लुफ्त अंजुमन का जब दिल ही बुज गया हूं


Duniya ke mehfilon se ghabra gaya hoon yaa rab

Kya luft anjuman ka, jab dil hi bujh gaya ho




गिरते हैं सजदो में हम अपने ही हसरतों के खातिर इकबाल

अगर गिरते सिर्फ इश्क़-ए-खुदा मैं तो कोई हसरत अधूरी ना रहती 


Girte hain sajdon mein hum, apni hi hasraton ki khaatir Iqbal

Agar girte sirf ishq-e-khuda mein, to koi hasrat adhuri na rehti




हर वक्त का हंसना तुझे बर्बाद ना कर दे

तन्हाई के लम्हों में रो भी लिया कर


Har waqt ka hasna tujhe barbaad na kar de

Tanhaayi ke lamhon mein roa bhi lia kar




मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिंदी है हम वतन है हिंदुस्तान हमारा


Mazhab nahi sikhata aapas mein bair rakhna,

Hindi hain hum, watan hai hindustaan humara




हुस्ने-ए-किरदार से नूर-ए-मुजस्सम हो जाए

की इब्लीस भी तुझे देखें तो मुसलमान हो जाए


Husn-e-kirdaar se noor-e-mujassam  hojaye

Ki ibliees bhi tujhe dekhe to musalmaan hojaye





मिट जाए गुनाहो का तसव्वुर ही जहां से इकबाल

अगर हो जाए यकीन के खुदा देख रहा है


Mit jaaye gunaahon ka tassavur hi, jahan se Iqbal

Agar ho jaye yaqeen ke khuda dekh raha hai





तेरी रहमत पर मुहसिर 

मेरे हर अमल की कुबुलियत

ना मुझे सलीका इल्तजा ना मुझे शाऊंरी

नमाज है


Tere rehmat pe hai muhasir 

 mere har amal ki qubuliyat

Na mujhe saleeqa iltija na mujhe shaoori  namaaz hai





तहजीब सिखाती हैं जीने का सलीका

इल्म हासिल कर लेने से जाहिल की जहिलत नहीं जाती


Tehzeeb sikhati hai jeene ka saleeka

Ilm hasil karlene se jaahil ki jahalat nahi jaati



allama iqbal poetry


क्यों पीते हैं लोग शराब किसके गम में इकबाल

झूठे यार के खातिर सच्चे खुदा को नाराज करते हैं लोग



Kyun peete hai log sharab kisi ke ghum mein Iqbal

Jhute yaar ke khatir, sacche khuda ko naraaz karte hain log




तेरी दुआ है कि हो तेरी आरजू पूरी

मेरी दुआ है तेरी आरजू बदल जाए



Teri dua hai ke, ho teri aarzu poori

Meri dua hai, teri aarzu badal jaye





मैं तुझको तुझसे ज्यादा और सबसे ज्यादा चाहूंगा

मगर शर्त यह है कि अपने अंदर मेरी जुस्तजू तो पैदा कर



Main tujh ko tujh se zyada aur sab se zyada chahunga

Magar shart ye hai ke, apne andar meri justuju  to paida kar





अगर ना बदलू तेरी खातिर हर चीज को तो कहना

तू अपने आप में पहले अंदाजे ए वफा तो पैदा कर


Agar na badlun teri khatir har jeez ko to kehna

Tu apne aap mein pehle andaaz-e-wafa to paida kar





जमाना भूल जाता है तेरी एक दीदी के खातिर

खयालों से निकालते हैं तो सदियां बीत जाती है


Zamana bhool jaate hain, teri ek deed  ki khaatir

Khayaalon se nikalte hain, to sadiyan beet jaati hain


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allama iqbal famous poetry 


सर झुकाने से नमाज अदा नहीं होती

दिल झुकाना पड़ता है इबादत के लिए


Sar jhukane se namaaz ada nahi hotein

Dil jhukana padhta hai ibaadat ke liye




हंसी आती है मुझे हसरत ए इंसान पर 

गुनाह करता है खुद लानत भेजता है शैतान पर


Hansi aati hai mujhe hasrat-e-insaan par

Gunah karte hai khud, laanat bhejte hai shaitaan par





अल्लाह को भूल गए लोग फिकरे रोजी में

तलाश रिज़्क की है राजिक का खयाल नहीं


Allah ko bhool gaye log fikr-e-rozi mein

Talassh rizzaq ki hai, raaziq  ka khayal hi nahi





ढूंढता फिरता हूं मैं इकबाल अपने आप को 

आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंजिल हूं में


Dhundta phirta hoon main Iqbal apne aap ko

Aap hi goya musafir, aap hi manzil hoon mein




तेरे आजाद बंदों की ना यह दुनिया ना वो दुनिया

यहां मरने की पाबंदी वहां जीने की पाबंदी


Tere azaad bando ki na ye duniya, na wo duniya

Yahan marne ki pabandi, waha jeene ki pabandi




100 बार कहां मैंने इंकार है मोहब्बत से

हर बार सदा अाई तुम दिल से नहीं कहते


Sau baar kaha maine inqaar hai mohabbat se

Har baar sada aayi, tum dil se nahi kehte





रुलाया ना कर हर बात पर ए 

जिंदगी ज़रुरी नहीं सब की किस्मत में

चुप करवाने वाले हो 



Rulaya Na Kar Har Baat Pr Aye

Zindagi Zruri Nhai Sab Ki Qismat Mein

Chup Krwane Wale Hoon.




वक्त के एक तमाचे की देर है साहेब।

मेरी फकीरी भी क्या तेरी बादशाही भी क्या..




Waqt ke ek tamache ki der hai saaheb.

Meri fakiri bhi kya teri baadshahi bhi kya..




गुलामी में ना काम आती है शमशीरें ना तकबीरे

जो हो ज़ौक-ऐ-यक़ीं पैदा तो कट जाती है जंजीरें



Gulaamee mein na kaam aatee hai shamasheeren na takabeere

 Jo ho zauk-ai-yaqeen paida to kat jaatee hai janjeeren

 

 

 



बातिल से दबने वाले ऐ आसमां नहीं हम

सौ बार कर चुका है तू इम्तिहां हमारा




baatil se dabane vaale ai aasamaan nahin ham 

sau baar kar chuka hai too imtihaan hamaara







हुई ना आम जहां में कभी हुकूमत-ए-इश्क़

सबब ये है कि मोहब्बत ज़माना साज नहीं



huee na aam jahaan mein kabhee hukoomat-e-ishq 

sabab ye hai ki mohabbat zamaana saaj nahin




मजनूं ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे

नज़्जारो की हवस हो तो लैला भी छोड़ दे




majanoon ne shahar chhoda to sahara bhee chhod de 

nazjaaro kee havas ho to laila bhee chhod de


ये माल -ओ-दौलत-ए-दुनिया

ये रिश्ता ओ Paiwand

बुतान-ए-वहम-ओ-गुमान

ला इलाहा इल्लल्लाह।



Ye Mal-O-Daulat-E-Duniya

Ye Rishta O Paiwand

Butan-E-Wahm-O-Guman

La-Ilaha-Illallaha.






इस दौर की ज़ुल्मत में हर क़ल्ब इ परेशान को,

वो दाग़ इ मुहब्बत दे जो चाँद को शर्मा दे। 



is daur kee zulmat mein har qalb e pareshaan ko, 

vo daag e muhabbat de jo chaand ko sharma de.




लौट आना मेरा दिल का

करार  बन करो

रह गई जिंदजी सर्फ तेरा

करार बन कर इंतजार बन कर।




Laut aana mera Dil ka

Karar ban kar

Reh gai jindzi serf tera

karar ban kar intzar ban kr.




सौदा-गरी नहीं ये इबादत ख़ुदा की है

ऐ बे-ख़बर जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दे


sauda-gari nahin ye ibaadat khuda ki hai

ai be-khabar jaza ki tamanna bhi chhod de





उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं

कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए


uruj-e-aadam-e-khaaki se anjum sahame jaate hain

ki ye tuta hua taara mah-e-kaamil na ban jae





निगाह-ए-इश्क़ दिल-ए-ज़िंदा की तलाश में है

शिकार-ए-मुर्दा सज़ा-वार-ए-शाहबाज़ नहीं


nigaah-e-ishq dil-e-zinda ki talaash mein hai

shikaar-e-murda saza-vaar-e-shaahabaaz nahin






नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त

ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना


nahin is khuli faza mein koi gosha-e-faraagat

ye jahaan ajab jahaan hai na qafas na aashiyaana





Han Dikha De Ae Tasuwar Phir Wo Subah Sham Tu

Dor Peche Ki Taraf Ae Gardish-E Ayam Tu



मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है in hindi 



मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है

ख़ानक़ाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है


मंज़िल-ए-रह-रवाँ दूर भी दुश्वार भी है

कोई इस क़ाफ़िले में क़ाफ़िला-सालार भी है


बढ़ के ख़ैबर से है ये मारका-ए-दीन-ओ-वतन

इस ज़माने में कोई हैदर-ए-कर्रार भी है


इल्म की हद से परे बंदा-ए-मोमिन के लिए

लज़्ज़त-ए-शौक़ भी है नेमत-ए-दीदार भी है


पीर-ए-मय-ख़ाना ये कहता है कि ऐवान-ए-फ़रंग

सुस्त-बुनियाद भी है आईना-दीवार भी है



maktabon mein kahin ranai-e-afkar bhi hai in urdu and english



maktabon mein kahin ranai-e-afkar bhi hai

KHanqahon mein kahin lazzat-e-asrar bhi hai

manzil-e-rah-rawan dur bhi dushwar bhi hai

koi is qafile mein qafila-salar bhi hai


baDh ke KHaibar se hai ye marka-e-din-o-watan

is zamane mein koi haidar-e-karrar bhi hai


ilm ki had se pare banda-e-momin ke liye

lazzat-e-shauq bhi hai nemat-e-didar bhi hai


pir-e-mai-KHana ye kahta hai ki aiwan-e-farang

sust-buniyaad bhi hai aaina-diwar bhi hai



मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी



मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी

मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी


तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया

यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी


हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को

मिरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी


गुज़र-औक़ात कर लेता है ये कोह ओ बयाबाँ में

कि शाहीं के लिए ज़िल्लत है कार-ए-आशियाँ-बंदी


ये फ़ैज़ान-ए-नज़र था या कि मकतब की करामत थी

सिखाए किस ने इस्माईल को आदाब-ए-फ़रज़ंदी


ज़ियारत-गाह-ए-अहल-ए-अज़्म-ओ-हिम्मत है लहद मेरी

कि ख़ाक-ए-राह को मैं ने बताया राज़-ए-अलवंदी


मिरी मश्शातगी की क्या ज़रूरत हुस्न-ए-मअ'नी को

कि फ़ितरत ख़ुद-ब-ख़ुद करती है लाले की हिना-बंदी




mata-e-be-baha hai dard-o-soz-e-arzumandi in urdu and english




mata-e-be-baha hai dard-o-soz-e-arzumandi

maqam-e-bandagi de kar na lun shan-e-KHudawandi

tere aazad bandon ki na ye duniya na wo duniya

yahan marne ki pabandi wahan jine ki pabandi


hijab iksir hai aawara-e-ku-e-mohabbat ko

meri aatish ko bhaDkati hai teri der-paiwandi


guzar-auqat kar leta hai ye koh o bayaban mein

ki shahin ke liye zillat hai kar-e-ashiyan-bandi


ye faizan-e-nazar tha ya ki maktab ki karamat thi

sikhae kis ne ismail ko aadab-e-farzandi


ziyarat-gah-e-ahl-e-azm-o-himmat hai lahad meri

ki KHak-e-rah ko main ne bataya raaz-e-alwandi


meri mashshatgi ki kya zarurat husn-e-mani ko

ki fitrat KHud-ba-KHud karti hai lale ki hina-bandi




मिरी नवा से हुए ज़िंदा आरिफ़ ओ आमी 



मिरी नवा से हुए ज़िंदा आरिफ़ ओ आमी 

दिया है मैं ने उन्हें ज़ौक़-ए-आतिश आशामी 


हरम के पास कोई आजमी है ज़मज़मा-संज 

कि तार तार हुए जामा हाए एहरामी 


हक़ीक़त-ए-अबदी है मक़ाम-ए-शब्बीरी 

बदलते रहते हैं अंदाज़-ए-कूफ़ी ओ शामी 


मुझे ये डर है मुक़ामिर हैं पुख़्ता-कार बहुत 

न रंग लाए कहीं तेरे हाथ की ख़ामी 


अजब नहीं कि मुसलमाँ को फिर अता कर दें 

शिकवा-ए-संजर ओ फ़क़्र-ए-जुनेद ओ बस्तामी 


क़बा-ए-इल्म ओ हुनर लुत्फ़-ए-ख़ास है वर्ना 

तिरी निगाह में थी मेरी ना-ख़ुश अंदामी 



meri nawa se hue zinda aarif o aami in urdu and english



meri nawa se hue zinda aarif o aami

diya hai main ne unhen zauq-e-atish aashami

haram ke pas koi aajmi hai zamzama-sanj

ki tar tar hue jama hae ehrami


haqiqat-e-abadi hai maqam-e-shabbiri

badalte rahte hain andaz-e-kufi o shami


mujhe ye Dar hai muqamir hain puKHta-kar bahut

na rang lae kahin tere hath ki KHami


ajab nahin ki musalman ko phir ata kar den

shikwa-e-sanjar o faqr-e-juned o bastami


qaba-e-ilm o hunar lutf-e-KHas hai warna

teri nigah mein thi meri na-KHush andami





Anokhi Waza Hai Sare Zamane Se Nirale Hain

Ye Aashiq Kon Se Basti Key A Rab Rehne Wale Hain



अनोखी वजह है सारे जमाने से निराले हैं

ये आशिक कौन से बस्ती के या  रब रहने वाले हैं


musalman ke lahu mein hai saliqa dil-nawazi ka in hindi and urdu 


musalman ke lahu mein hai saliqa dil-nawazi ka

murawwat husn-e-alam-gir hai mardan-e-ghazi ka

shikayat hai mujhe ya rab KHudawandan-e-maktab se

sabaq shahin bachchon ko de rahe hain KHak-bazi ka


bahut muddat ke naKHchiron ka andaz-e-nigah badla

ki main ne fash kar Dala tariqa shah-bazi ka


qalandar juz do harf-e-la-ilah kuchh bhi nahin rakhta

faqih-e-shahr qarun hai lughat-ha-e-hijazi ka


hadis-e-baada-o-mina-o-jam aati nahin mujh ko

na kar KHara-shigafon se taqaza shisha-sazi ka


kahan se tu ne ai ‘iqbaal’ sikhi hai ye darweshi

ki charcha padshahon mein hai teri be-niyazi ka




माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतज़ार देख



maana ki teree deed ke qaabil nahin hoon main 

too mera shauq dekh mira intazaar dekh




मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन न सका


masjid to bana dee shab bhar mein eemaan kee haraarat vaalon ne 

man apana puraana paapee hai barason mein namaazee ban na saka



नहीं तेरा नशेमनं कसर्-ए-शुलतानी के गुम्बद पर,

तू शाहीन बसेर कर पहाडों की चट्टानो में!!



nahin tera nashemanan kasar-e-shulataanee ke gumbad par, 

too shaaheen baser kar pahaadon kee chattaano mein!!


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तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ 



तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ 

मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ 


सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी 

कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ 


ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को 

कि मैं आप का सामना चाहता हूँ 


ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना 

वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ 


कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल 

चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ 


भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी 

बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ



tere ishq kii intahaa chaahataa huu. in urdu and english



tere ishq kii intahaa chaahataa huu.

merii saadagii dekh kyaa chaahataa huu.



sitam ho ki ho vaadaa-e-behijaabii

ko_ii baat sabr-aazamaa chaahataa huu.



ye jannat mubaarak rahe zaahido.n ko

ki mai.n aap kaa saamanaa chaahataa huu.



ko_ii dam kaa mehamaa.N huu.N ai ahal-e-mahafil

chiraaG-e-sahar huu.N, bujhaa chaahataa huu.



bharii bazm me.n raaz kii baat kah dii

ba.Daa be-adab huu.N, sazaa chaahataa huu.





lastrip3ioei




garm-e-fuġhāñ hai jaras uTh ki gayā qāfila 

vaa.e vo rah-rau ki hai muntazir-e-rāhila 


terī tabī.at hai aur terā zamāna hai aur 

tere muāfiq nahīñ ḳhānqahī silsila 


dil ho ġhulām-e-ḳhirad yā ki imām-e-ḳhirad 

sālik-e-rah hoshiyār saḳht hai ye marhala 


us kī ḳhudī hai abhī shām-o-sahar meñ asiir 

gardish-e-daurāñ kā hai jis kī zabāñ par gila 


tere nafas se huī ātish-e-gul tez-tar 

murġh-e-chaman hai yahī terī navā kā sila 




न हो तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी तो मैं रहता नहीं बाक़ी


न हो तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी तो मैं रहता नहीं बाक़ी

कि मेरी ज़िंदगी क्या है यही तुग़्यान-ए-मुश्ताक़ी


मुझे फ़ितरत नवा पर पय-ब-पय मजबूर करती है

अभी महफ़िल में है शायद कोई दर्द-आश्ना बाक़ी


वो आतिश आज भी तेरा नशेमन फूँक सकती है

तलब सादिक़ न हो तेरी तो फिर क्या शिकवा-ए-साक़ी


न कर अफ़रंग का अंदाज़ा उस की ताबनाकी से

कि बिजली के चराग़ों से है इस जौहर की बर्राक़ी


दिलों में वलवले आफ़ाक़-गीरी के नहीं उठते

निगाहों में अगर पैदा न हो अंदाज़-ए-आफ़ाक़ी


ख़िज़ाँ में भी कब आ सकता था मैं सय्याद की ज़द में

मिरी ग़म्माज़ थी शाख़-ए-नशेमन की कम औराक़ी


उलट जाएँगी तदबीरें बदल जाएँगी तक़दीरें

हक़ीक़त है नहीं मेरे तख़य्युल की है ख़ल्लाक़ी



Na Ho Tughyan-e-Mushtaqi To Main Rehta Nahin Baqi in urdu and english



Na Ho Tughyan-e-Mushtaqi To Main Rehta Nahin Baqi

Ke Meri Zindagi Kya Hai, Yehi Tughyan-e-Mushtaqi


Mujhe Fitrat Nawa Par Pe-Ba-Pe Majboor Karti Hai

Abhi Mehfil Mein Hai, Shaid Koi Dard Ashna Baqi


Woh Atish Aaj Bhi Tera Nasheman Phook Sakti Hai

Talab Sadiq Na Ho Teri To Phir Kya Shikwa-e-Saqi !


Na Kar Afrang Ka Andaza Iss Ki Tabnaki Se

Ke Bijli Ke Charaghon Se Hai Iss Jouhar Ki Barraqi


Dilon Mein Walwale Afaaq Geeri Ke Nahin Uthte

Nigahon Mein Agar Paida Na Huwa Andaz-e-Afaqi


Khazan Mein Bhi Kab Aa Sakta Tha Main Sayyaad Ki Zad Mein

Meri Ghammaz  Thi Shakh-e-Nasheeman Ki Kam-Auraqi


Ulat Jaen Gi Tadbeerain, Badal Jaen Gi Taqdeerain

Haqiqat Hai, Nahin Mere Takhayyul Ki Ye Khallaqi




ये दैर-ए-कुहन क्या है अम्बार-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक 



ये दैर-ए-कुहन क्या है अम्बार-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक

मुश्किल है गुज़र इस में बे-नाला-ए-आतिशनाक


नख़चीर-ए-मोहब्बत का क़िस्सा नहीं तूलानी

लुत्फ़-ए-ख़लिश-ए-पैकाँ आसूदगी-ए-फ़ितराक


खोया गया जो मतलब हफ़्ताद ओ दो मिल्लत में

समझेगा न तू जब तक बे-रंग न हो इदराक


इक शर-ए-मुसलमानी इक जज़्ब-ए-मुसलमानी

है जज़्ब-ए-मुसलमानी सिर्र-ए-फ़लक-उल-अफ़्लाक


ऐ रहरव-ए-फ़रज़ाना बे-जज़्ब-ए-मुसलमानी

ने राह-ए-अमल पैदा ने शाख़-ए-यक़ीं नमनाक


रमज़ीं हैं मोहब्बत की गुस्ताख़ी ओ बेबाकी

हर शौक़ नहीं गुस्ताख़ हर जज़्ब नहीं बेबाक


फ़ारिग़ तो न बैठेगा महशर में जुनूँ मेरा

या अपना गरेबाँ चाक या दामन-ए-यज़्दाँ चाक



ye dair-e-kuhan kya hai ambar-e-KHas-o-KHashak in urdu and english




ye dair-e-kuhan kya hai ambar-e-KHas-o-KHashak 

mushkil hai guzar is mein be-nala-e-atishnak 


naKHchir-e-mohabbat ka qissa nahin tulani 

lutf-e-KHalish-e-paikan aasudgi-e-fitrak 


khoya gaya jo matlab haftad o do millat mein 

samjhega na tu jab tak be-rang na ho idrak 


ek shar-e-musalmani ek jazb-e-musalmani 

hai jazb-e-musalmani sirr-e-falak-ul-aflak 


ai rahraw-e-farzana be-jazb-e-musalmani 

ne rah-e-amal paida ne shaKH-e-yaqin namnak 


ramzin hain mohabbat ki gustaKHi o bebaki 

har shauq nahin gustaKH har jazb nahin bebak 


farigh to na baiThega mahshar mein junun mera 

ya apna gareban chaak ya daman-e-yazdan chaak 





लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी



लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

ज़िंदगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!

दूर दुनिया का मिरे दम से अंधेरा हो जाए!

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!

हो मिरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत


जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब

इल्म की शमा से हो मुझ को मोहब्बत या-रब

हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना

मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को

नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को



Lab Pe Aati Hai Dua Ban Ke Tamanna Meri in urdu and emglish




Lab Pe Aati Hai Dua Ban Ke Tamanna Meri

Lab Pe Aati Hai Dua Ban Ke Tamanna Meri

Zindagi Shamma Ki Surat Ho, Khuda Ya Meri

Lab Pe Aati Hai Dua Ban Ke Tamanna Meri

Ho Mere Dum Se Yun Hi Mere Watan Ki Zeenat



Jis Tarah Phool Se Hoti Hai Chaman Ki Zeenat

Zindagi Ho Meri Parwaane Ki Surat Ya Rab

Ilm Ki Shamma Se Ho Mujh Ko Muhabbat Ya Rab 

Ho Mera Kaam Gareebon Ki Himaayat Karna 

Dardmandon Se, Zayifon Se Muhabbat Karna 


Mere Allah Buraayi Se Bachaana Mujh Ko

Nek Jo Raah Ho Uss Reh Pe Chalaana Mujh Ko

Mere Allah Buraayi Se Bachaana Mujh Ko

Nek Jo Raah Ho Uss Reh Pe Chalaana Mujh Ko



Mere Allah Buraayi Se Bachaana Mujh Ko

Nek Jo Raah Ho Uss Reh Pe Chalaana Mujh Ko

Mere Allah Buraayi Se Bachaana Mujh Ko..






दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर 



दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा कर 

नया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा कर 


ख़ुदा अगर दिल-ए-फ़ितरत-शनास दे तुझ को 

सुकूत-ए-लाला-ओ-गुल से कलाम पैदा कर 


उठा न शीशागरान-ए-फ़रंग के एहसाँ 

सिफ़ाल-ए-हिन्द से मीना ओ जाम पैदा कर 


मैं शाख़-ए-ताक हूँ मेरी ग़ज़ल है मेरा समर 

मिरे समर से मय-ए-लाला-फ़ाम पैदा कर 


मिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी है 

ख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर 



dayaar-e-ishq mein apana maqaam paida kar in urdu and english

 


dayaar-e-ishq mein apana maqaam paida kar 

naya zamaana nae subh o shaam paida kar


 khuda agar dil-e-fitarat-shanaas de tujh ko 

 sukoot-e-laala-o-gul se kalaam paida kar 

 

 

 utha na sheeshaagaraan-e-farang ke ehasaan

  sifaal-e-hind se meena o jaam paida kar 

  

  

  main shaakh-e-taak hoon meree gazal hai mera samar

   mire samar se may-e-laala-faam paida kar

   

    mira tareeq ameeree nahin faqeeree hai

     khudee na bech gareebee mein naam paida kar


tere ishq ki intiha chahta hun 



tere ishq ki intiha chahta hun 

meri sadgi dekh kya chahta hun 


sitam ho ki ho wada-e-be-hijabi 

koi baat sabr-azma chahta hun 


ye jannat mubarak rahe zahidon ko 

ki main aap ka samna chahta hun 


zara sa to dil hun magar shoKH itna 

wahi lan-tarani suna chahta hun 


koi dam ka mehman hun ai ahl-e-mahfil 

charagh-e-sahar hun bujha chahta hun 


bhari bazm mein raaz ki baat kah di 

baDa be-adab hun saza chahta hun




तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ 

मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ 


सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी 

कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ 


ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को 

कि मैं आप का सामना चाहता हूँ 


ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना 

वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ 


कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल 

चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ 


भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी 

बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ 


sitaron se aage jahan aur bhi hain 



sitaron se aage jahan aur bhi hain 
abhi ishq ke imtihan aur bhi hain 

tahi zindagi se nahin ye fazaen 
yahan saikDon karwan aur bhi hain 

qanaat na kar aalam-e-rang-o-bu par 
chaman aur bhi aashiyan aur bhi hain 

agar kho gaya ek nasheman to kya gham 
maqamat-e-ah-o-fughan aur bhi hain 

tu shahin hai parwaz hai kaam tera 
tere samne aasman aur bhi hain 

isi roz o shab mein ulajh kar na rah ja 
ki tere zaman o makan aur bhi hain 

gae din ki tanha tha main anjuman mein 
yahan ab mere raaz-dan aur bhi hain 



सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

तही ज़िन्दगी से नहीं ये फ़ज़ायें
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं

क़ना'अत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू[4]पर
चमन और भी, आशियाँ और भी हैं

अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं

तू शाहीं[ है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमाँ और भी हैं



KHird-mandon se kya puchhun ki meri ibtida kya hai 
ki main is fikr mein rahta hun meri intiha kya hai 

KHudi ko kar buland itna ki har taqdir se pahle 
KHuda bande se KHud puchhe bata teri raza kya hai 

maqam-e-guftugu kya hai agar main kimiya-gar hun 
yahi soz-e-nafas hai aur meri kimiya kya hai 

nazar aain mujhe taqdir ki gahraiyan is mein 
na puchh ai ham-nashin mujh se wo chashm-e-surma-sa kya hai 

agar hota wo majzub-e-farangi is zamane mein 
to 'iqbaal' us ko samjhata maqam-e-kibriya kya hai 

nawa-e-subh-gahi ne jigar KHun kar diya mera 
KHudaya jis KHata ki ye saza hai wo KHata kya hai 



majnun ne shahr chhoDa to sahra bhi chhoD de 




majnun ne shahr chhoDa to sahra bhi chhoD de 
nazzare ki hawas ho to laila bhi chhoD de 

waiz kamal-e-tark se milti hai yan murad 
duniya jo chhoD di hai to uqba bhi chhoD de 

taqlid ki rawish se to behtar hai KHud-kushi 
rasta bhi DhunD KHizr ka sauda bhi chhoD de 

manind-e-KHama teri zaban par hai harf-e-ghair 
begana shai pe nazish-e-beja bhi chhoD de 

lutf-e-kalam kya jo na ho dil mein dard-e-ishq 
bismil nahin hai tu to taDapna bhi chhoD de 

shabnam ki tarah phulon pe ro aur chaman se chal 
is bagh mein qayam ka sauda bhi chhoD de 

hai aashiqi mein rasm alag sab se baiThna 
but-KHana bhi haram bhi kalisa bhi chhoD de 

sauda-gari nahin ye ibaadat KHuda ki hai 
ai be-KHabar jaza ki tamanna bhi chhoD de 

achchha hai dil ke sath rahe pasban-e-aql 
lekin kabhi kabhi ise tanha bhi chhoD de 

jina wo kya jo ho nafas-e-ghair par madar 
shohrat ki zindagi ka bharosa bhi chhoD de 

shoKHi si hai sawal-e-mukarrar mein ai kalim 
shart-e-raza ye hai ki taqaza bhi chhoD de 

waiz subut lae jo mai ke jawaz mein 
'iqbaal' ko ye zid hai ki pina bhi chhoD de 


gesu-e-tabdar ko aur bhi tabdar kar 




gesu-e-tabdar ko aur bhi tabdar kar 
hosh o KHirad shikar kar qalb o nazar shikar kar 



ishq bhi ho hijab mein husn bhi ho hijab mein 
ya to KHud aashkar ho ya mujhe aashkar kar 



tu hai muhit-e-be-karan main hun zara si aabju 
ya mujhe ham-kanar kar ya mujhe be-kanar kar 



main hun sadaf to tere hath mere guhar ki aabru 
main hun KHazaf to tu mujhe gauhar-e-shahwar kar 



naghma-e-nau-bahaar agar mere nasib mein na ho 
us dam-e-nim-soz ko tairak-e-bahaar kar 



bagh-e-bahisht se mujhe hukm-e-safar diya tha kyun 
kar-e-jahan daraaz hai ab mera intizar kar 



roz-e-hisab jab mera pesh ho daftar-e-amal 
aap bhi sharmsar ho mujh ko bhi sharmsar kar 



na tu zamin ke liye hai na aasman ke liye 


 

na tu zamin ke liye hai na aasman ke liye 
jahan hai tere liye tu nahin jahan ke liye 

ye aql o dil hain sharar shola-e-mohabbat ke 
wo KHar-o-KHas ke liye hai ye nistan ke liye 

maqam-e-parwarish-e-ah-o-lala hai ye chaman 
na sair-e-gul ke liye hai na aashiyan ke liye 

rahega rawi o nil o furaat mein kab tak 
tera safina ki hai bahr-e-be-karan ke liye 

nishan-e-rah dikhate the jo sitaron ko 
taras gae hain kisi mard-e-rah-dan ke liye 

nigah buland suKHan dil-nawaz jaan pur-soz 
yahi hai raKHt-e-safar mir-e-karwan ke liye 

zara si baat thi andesha-e-ajam ne use 
baDha diya hai faqat zeb-e-dastan ke liye 

mere gulu mein hai ek naghma jibrail-ashob 
sambhaal kar jise rakkha hai la-makan ke liye 



mujhe aah-o-fughan-e-nim-shab ka phir payam aaya 



mujhe aah-o-fughan-e-nim-shab ka phir payam aaya 
tham ai rah-rau ki shayad phir koi mushkil maqam aaya 

zara taqdir ki gahraiyon mein Dub ja tu bhi 
ki is jangah se main ban ke tegh-e-be-niyam aaya 

ye misra likh diya kis shoKH ne mehrab-e-masjid par 
ye nadan gir gae sajdon mein jab waqt-e-qayam aaya 

chal ai meri gharibi ka tamasha dekhne wale 
wo mahfil uTh gai jis dam to mujh tak daur-e-jam aaya 

diya 'iqbaal' ne hindi musalmanon ko soz apna 
ye ek mard-e-tan-asan tha tan-asanon ke kaam aaya 

usi 'iqbaal' ki main justuju karta raha barson 
baDi muddat ke baad aaKHir wo shahin zer-e-dam aaya



meri nawa-e-shauq se shor harim-e-zat mein 





meri nawa-e-shauq se shor harim-e-zat mein 
ghulghula-ha-e-al-aman but-kada-e-sifat mein 

hur o farishta hain asir mere taKHaiyyulat mein 
meri nigah se KHalal teri tajalliyat mein 

garche hai meri justuju dair o haram ki naqsha-band 
meri fughan se rustaKHez kaba o somnat mein 

gah meri nigah-e-tez chir gai dil-e-wajud 
gah ulajh ke rah gai mere tawahhumat mein 

tu ne ye kya ghazab kiya mujh ko bhi fash kar diya 
main hi to ek raaz tha sina-e-kaenat mein 



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DhunD raha hai farang aish-e-jahan ka dawam 
wa-e-tamanna-e-KHam wa-e-tamanna-e-KHam 

pir-e-haram ne kaha sun ke meri ruedad 
puKHta hai teri fughan ab na ise dil mein tham 

tha areni go kalim main areni go nahin 
us ko taqaza rawa mujh pe taqaza haram 

garche hai ifsha-e-raaz ahl-e-nazar ki fughan 
ho nahin sakta kabhi shewa-e-rindana aam 

halqa-e-sufi mein zikr be-nam o be-soz-o-saz 
main bhi raha tishna-kaam tu bhi raha tishna-kaam 

ishq teri intiha ishq meri intiha 
tu bhi abhi na-tamam main bhi abhi na-tamam 

aah ki khoya gaya tujh se faqiri ka raaz 
warna hai mal-e-faqir saltanat-e-rum-o-sham 



kushada dast-e-karam jab wo be-niyaz kare 




kushada dast-e-karam jab wo be-niyaz kare 
niyaz-mand na kyun aajizi pe naz kare 

biTha ke arsh pe rakkha hai tu ne ai waiz 
KHuda wo kya hai jo bandon se ehtiraaz kare 

meri nigah mein wo rind hi nahin saqi 
jo hoshiyari o masti mein imtiyaz kare 

mudam gosh-ba-dil rah ye saz hai aisa 
jo ho shikasta to paida nawa-e-raaz kare 

koi ye puchhe ki waiz ka kya bigaDta hai 
jo be-amal pe bhi rahmat wo be-niyaz kare 

suKHan mein soz ilahi kahan se aata hai 
ye chiz wo hai ki patthar ko bhi gudaz kare 

tamiz-e-lala-o-gul se hai nala-e-bulbul 
jahan mein wa na koi chashm-e-imtiyaz kare 

ghurur-e-zohd ne sikhla diya hai waiz ko 
ki bandagan-e-KHuda par zaban daraaz kare 

hawa ho aisi ki hindostan se ai 'iqbaal' 
uDa ke mujh ko ghubar-e-rah-e-hijaz kare 



9999



sama sakta nahin pahna-e-fitrat mein mera sauda 
ghalat tha ai junun shayad tera andaza-e-sahra 
KHudi se is tilism-e-rang-o-bu ko toD sakte hain 

yahi tauhid thi jis ko na tu samjha na main samjha 
nigah paida kar ai ghafil tajalli ain-e-fitrat hai 

ki apni mauj se begana rah sakta nahin dariya 
raqabat ilm o irfan mein ghalat-bini hai mimbar ki 

ki wo hallaj ki suli ko samjha hai raqib apna 
KHuda ke pak bandon ko hukumat mein ghulami mein 

zirah koi agar mahfuz rakhti hai to istighna 
na kar taqlid ai jibril mere jazb-o-masti ki 

tan-asan arshiyon ko zikr o tasbih o tawaf aula 
bahut dekhe hain main ne mashriq o maghrib ke mai-KHane 
yahan saqi nahin paida wahan be-zauq hai sahba 
na iran mein rahe baqi na turan mein rahe baqi 

wo bande faqr tha jin ka halak-e-qaisar-o-kisra 
yahi shaiKH-e-haram hai jo chura kar bech khata hai 

galim-e-buzar o dalq-e-uwes o chadar-e-zahra 
huzur-e-haq mein israfil ne meri shikayat ki 

ye banda waqt se pahle qayamat kar na de barpa 
nida aai ki aashob-e-qayamat se ye kya kam hai 

' girafta chiniyan ehram o makki KHufta dar batha 
labaalab shisha-e-tahzib-e-hazir hai mai-e-la se 

magar saqi ke hathon mein nahin paimana-e-illa 
daba rakkha hai is ko zaKHma-war ki tez-dasti ne 
bahut niche suron mein hai abhi europe ka wawaila 

isi dariya se uThti hai wo mauj-e-tund-jaulan bhi 
nahangon ke nasheman jis se hote hain tah-o-baala 

ghulami kya hai zauq-e-husn-o-zebai se mahrumi 
jise zeba kahen aazad bande hai wahi zeba 

bharosa kar nahin sakte ghulamon ki basirat par 
ki duniya mein faqat mardan-e-hur ki aankh hai bina 

wahi hai sahib-e-imroz jis ne apni himmat se 
zamane ke samundar se nikala gauhar-e-farda 

farangi shishagar ke fan se patthar ho gae pani 
meri iksir ne shishe ko baKHshi saKHti-e-KHara 

rahe hain aur hain firaun meri ghat mein ab tak 
magar kya gham ki meri aastin mein hai yad-e-baiza 

wo chingari KHas-o-KHashak se kis tarah dab jae 
jise haq ne kiya ho nistan ke waste paida 

mohabbat KHeshtan bini mohabbat KHeshtan dari 
mohabbat aastan-e-qaisar-o-kisra se be-parwa 

ajab kya gar mah o parwin mere naKHchir ho jaen 
ki bar fitrak-e-sahib daulat-e-bastam sar-e-KHud ra 

wo dana-e-subul KHatmur-rusul maula-e-kul jis ne 
ghubar-e-rah ko baKHsha farogh-e-wadi-e-sina 

nigah-e-ishq o masti mein wahi awwal wahi aaKHir 
wahi quran wahi furqan wahi yasin wahi taha 

'sanai' ke adab se main ne ghawwasi na ki warna 
abhi is bahr mein baqi hain lakhon lulu-e-lala 



mata-e-be-baha hai dard-o-soz-e-arzumandi 



mata-e-be-baha hai dard-o-soz-e-arzumandi 
maqam-e-bandagi de kar na lun shan-e-KHudawandi 

tere aazad bandon ki na ye duniya na wo duniya 
yahan marne ki pabandi wahan jine ki pabandi 

hijab iksir hai aawara-e-ku-e-mohabbat ko 
meri aatish ko bhaDkati hai teri der-paiwandi 

guzar-auqat kar leta hai ye koh o bayaban mein 
ki shahin ke liye zillat hai kar-e-ashiyan-bandi 

ye faizan-e-nazar tha ya ki maktab ki karamat thi 
sikhae kis ne ismail ko aadab-e-farzandi 

ziyarat-gah-e-ahl-e-azm-o-himmat hai lahad meri 
ki KHak-e-rah ko main ne bataya raaz-e-alwandi 

meri mashshatgi ki kya zarurat husn-e-mani ko 
ki fitrat KHud-ba-KHud karti hai lale ki hina-bandi 




11


ye payam de gai hai mujhe baad-e-subh-gahi 
ki KHudi ke aarifon ka hai maqam padshahi 

teri zindagi isi se teri aabru isi se 
jo rahi KHudi to shahi na rahi to ru-siyahi 

na diya nishan-e-manzil mujhe ai hakim tu ne 
mujhe kya gila ho tujh se tu na rah-nashin na rahi 

mere halqa-e-suKHan mein abhi zer-e-tarbiyat hain 
wo gada ki jaante hain rah-o-rasm-e-kaj-kulahi 

ye muamle hain nazuk jo teri raza ho tu kar 
ki mujhe to KHush na aaya ye tariq-e-KHanqahi 

tu huma ka hai shikari abhi ibtida hai teri 
nahin maslahat se KHali ye jahan-e-murgh-o-mahi 

tu arab ho ya ajam ho tera la ilah illa 
lughat-e-gharib jab tak tera dil na de gawahi 




ya rab ye jahan-e-guzaran KHub hai lekin



ya rab ye jahan-e-guzaran KHub hai lekin 
kyun KHwar hain mardan-e-safa-kesh o hunar-mand 

go is ki KHudai mein mahajan ka bhi hai hath 
duniya to samajhti hai farangi ko KHudawand 

tu barg-e-gaya hai na wahi ahl-e-KHirad ra 
o kisht-e-gul-o-lala ba-baKHshad ba-KHare chand 

hazir hain kalisa mein kabab o mai-e-gulgun 
masjid mein dhara kya hai ba-juz mauiza o pand 

ahkaam tere haq hain magar apne mufassir 
tawil se quran ko bana sakte hain pazand 

firdaus jo tera hai kisi ne nahin dekha 
afrang ka har qarya hai firdaus ki manind 

muddat se hai aawara-e-aflak mera fikr 
kar de ise ab chand ke ghaaron mein nazar-band 

fitrat ne mujhe baKHshe hain jauhar malakuti 
KHaki hun magar KHak se rakhta nahin paiwand 

darwesh-e-KHuda-mast na sharqi hai na gharbi 
ghar mera na dilli na safahan na samarqand 

kahta hun wahi baat samajhta hun jise haq 
ne aabla-e-masjid hun na tahzib ka farzand 

apne bhi KHafa mujh se hain begane bhi na-KHush 
main zahr-e-halahal ko kabhi kah na saka qand 

mushkil hai ek banda-e-haq-bin-o-haq-andesh 
KHashak ke tode ko kahe koh-e-damawand 

hun aatish-e-namrud ke shoalon mein bhi KHamosh 
main banda-e-momin hun nahin dana-e-aspand 

pur-soz nazar-baz o niko-bin o kam aarzu 
aazad o giraftar o tahi kisa o KHursand 

har haal mein mera dil-e-be-qaid hai KHurram 
kya chhinega ghunche se koi zauq-e-shakar-KHand 

chup rah na saka hazrat-e-yazdan mein bhi 'iqbaal' 
karta koi is banda-e-gustaKH ka munh band 


Shikwa




kyun zayan-kar banun sud-faramosh rahun 
fikr-e-farda na karun mahw-e-gham-e-dosh rahun 

nale bulbul ke sunun aur hama-tan gosh rahun 
ham-nawa main bhi koi gul hun ki KHamosh rahun 

jurat-amoz meri tab-e-suKHan hai mujh ko 
shikwa allah se KHakam-ba-dahan hai mujh ko 

hai baja shewa-e-taslim mein mashhur hain hum 
qissa-e-dard sunate hain ki majbur hain hum 
saz KHamosh hain fariyaad se mamur hain hum 

nala aata hai agar lab pe to mazur hain hum 
ai KHuda shikwa-e-arbab-e-wafa bhi sun le 

KHugar-e-hamd se thoDa sa gila bhi sun le 
thi to maujud azal se hi teri zat-e-qadim 

phul tha zeb-e-chaman par na pareshan thi shamim 
shart insaf hai ai sahib-e-altaf-e-amim 

bu-e-gul phailti kis tarah jo hoti na nasim 
hum ko jamiyat-e-KHatir ye pareshani thi 

warna ummat tere mahbub ki diwani thi 
hum se pahle tha ajab tere jahan ka manzar 

kahin masjud the patthar kahin mabud shajar 
KHugar-e-paikar-e-mahsus thi insan ki nazar 

manta phir koi an-dekhe KHuda ko kyunkar 
tujh ko malum hai leta tha koi nam tera 

quwwat-e-bazu-e-muslim ne kiya kaam tera 
bas rahe the yahin saljuq bhi turani bhi 

ahl-e-chin chin mein iran mein sasani bhi 
isi mamure mein aabaad the yunani bhi 

isi duniya mein yahudi bhi the nasrani bhi 
par tere nam pe talwar uThai kis ne 

baat jo bigDi hui thi wo banai kis ne 
the hamin ek tere marka-araon mein 

KHushkiyon mein kabhi laDte kabhi dariyaon mein 
din azanen kabhi europe ke kalisaon mein 

kabhi africa ke tapte hue sahraon mein 
shan aankhon mein na jachti thi jahan-daron ki 

kalma paDhte the hamin chhanw mein talwaron ki 
hum jo jite the to jangon ki musibat ke liye 

aur marte the tere nam ki azmat ke liye 
thi na kuchh teghzani apni hukumat ke liye 

sar-ba-kaf phirte the kya dahr mein daulat ke liye 
qaum apni jo zar-o-mal-e-jahan par marti 

but-faroshi ke ewaz but-shikani kyun karti 
Tal na sakte the agar jang mein aD jate the 

panw sheron ke bhi maidan se ukhaD jate the 
tujh se sarkash hua koi to bigaD jate the 

tegh kya chiz hai hum top se laD jate the 
naqsh-e-tauhid ka har dil pe biThaya hum ne 

zer-e-KHanjar bhi ye paigham sunaya hum ne 
tu hi kah de ki ukhaDa dar-e-KHaibar kis ne 

shahr qaisar ka jo tha us ko kiya sar kis ne 
toDe maKHluq KHudawandon ke paikar kis ne 

kaT kar rakh diye kuffar ke lashkar kis ne 
kis ne ThanDa kiya aatish-kada-e-iran ko 

kis ne phir zinda kiya tazkira-e-yazdan ko 
kaun si qaum faqat teri talabgar hui 

aur tere liye zahmat-kash-e-paikar hui 
kis ki shamshir jahangir jahan-dar hui 

kis ki takbir se duniya teri bedar hui 
kis ki haibat se sanam sahme hue rahte the 

munh ke bal gir ke hu-allahu-ahad kahte the 
aa gaya ain laDai mein agar waqt-e-namaz 

qibla-ru ho ke zamin-bos hui qaum-e-hijaz 
ek hi saf mein khaDe ho gae mahmud o ayaz 

na koi banda raha aur na koi banda-nawaz 
banda o sahab o mohtaj o ghani ek hue 

teri sarkar mein pahunche to sabhi ek hue 
mahfil-e-kaun-o-makan mein sahar o sham phire 

mai-e-tauhid ko le kar sifat-e-jam phire 
koh mein dasht mein le kar tera paigham phire 

aur malum hai tujh ko kabhi nakaam phire 
dasht to dasht hain dariya bhi na chhoDe hum ne 

bahr-e-zulmat mein dauDa diye ghoDe hum ne 
safha-e-dahr se baatil ko miTaya hum ne 

nau-e-insan ko ghulami se chhuDaya hum ne 
tere kabe ko jabinon se basaya hum ne 

tere quran ko sinon se lagaya hum ne 
phir bhi hum se ye gila hai ki wafadar nahin 

hum wafadar nahin tu bhi to dildar nahin 
ummaten aur bhi hain un mein gunahgar bhi hain 

ijz wale bhi hain mast-e-mai-e-pindar bhi hain 
un mein kahil bhi hain ghafil bhi hain hushyar bhi hain 

saikDon hain ki tere nam se be-zar bhi hain 
rahmaten hain teri aghyar ke kashanon par 

barq girti hai to bechaare musalmanon par 
but sanam-KHanon mein kahte hain musalman gae 

hai KHushi un ko ki kabe ke nigahban gae 
manzil-e-dahr se unTon ke hudi-KHwan gae 

apni baghlon mein dabae hue quran gae 
KHanda-zan kufr hai ehsas tujhe hai ki nahin 

apni tauhid ka kuchh pas tujhe hai ki nahin 
ye shikayat nahin hain un ke KHazane mamur 

nahin mahfil mein jinhen baat bhi karne ka shuur 
qahr to ye hai ki kafir ko milen hur o qusur 

aur bechaare musalman ko faqat wada-e-hur 
ab wo altaf nahin hum pe inayat nahin 

baat ye kya hai ki pahli si mudaraat nahin 
kyun musalmanon mein hai daulat-e-duniya nayab 

teri qudrat to hai wo jis ki na had hai na hisab 
tu jo chahe to uThe sina-e-sahra se habab 

rah-raw-e-dasht ho saili-zada-e-mauj-e-sarab 
tan-e-aghyar hai ruswai hai nadari hai 

kya tere nam pe marne ka ewaz KHwari hai 
bani aghyar ki ab chahne wali duniya 

rah gai apne liye ek KHayali duniya 
hum to ruKHsat hue auron ne sambhaali duniya 

phir na kahna hui tauhid se KHali duniya 
hum to jite hain ki duniya mein tera nam rahe 

kahin mumkin hai ki saqi na rahe jam rahe 
teri mahfil bhi gai chahne wale bhi gae 

shab ki aahen bhi gain subh ke nale bhi gae 
dil tujhe de bhi gae apna sila le bhi gae 

aa ke baiThe bhi na the aur nikale bhi gae 
aae ushshaq gae wada-e-farda le kar 

ab unhen DhunD charagh-e-ruKH-e-zeba le kar 
dard-e-laila bhi wahi qais ka pahlu bhi wahi 

najd ke dasht o jabal mein ram-e-ahu bhi wahi 
ishq ka dil bhi wahi husn ka jadu bhi wahi 

ummat-e-ahmad-e-mursil bhi wahi tu bhi wahi 
phir ye aazurdagi-e-ghair sabab kya mani 

apne shaidaon pe ye chashm-e-ghazab kya mani 
tujh ko chhoDa ki rasul-e-arabi ko chhoDa 

but-gari pesha kiya but-shikani ko chhoDa 
ishq ko ishq ki aashufta-sari ko chhoDa 

rasm-e-salman o uwais-e-qarani ko chhoDa 
aag takbir ki sinon mein dabi rakhte hain 

zindagi misl-e-bilal-e-habashi rakhte hain 
ishq ki KHair wo pahli si ada bhi na sahi 

jada-paimali-e-taslim-o-raza bhi na sahi 
muztarib dil sifat-e-qibla-numa bhi na sahi 

aur pabandi-e-ain-e-wafa bhi na sahi 

kabhi hum se kabhi ghairon se shanasai hai 
baat kahne ki nahin tu bhi to harjai hai 

sar-e-faran pe kiya din ko kaamil tu ne 
ek ishaare mein hazaron ke liye dil tu ne 

aatish-andoz kiya ishq ka hasil tu ne 
phunk di garmi-e-ruKHsar se mahfil tu ne 

aaj kyun sine hamare sharer-abaad nahin 
hum wahi soKHta-saman hain tujhe yaad nahin 

wadi-e-najd mein wo shor-e-salasil na raha 
qais diwana-e-nazzara-e-mahmil na raha 

hausle wo na rahe hum na rahe dil na raha 
ghar ye ujDa hai ki tu raunaq-e-mahfil na raha 

ai KHusha aan roz ki aai o ba-sad naz aai 
be-hijabana su-e-mahfil-e-ma baz aai 

baada-kash ghair hain gulshan mein lab-e-ju baiThe 
sunte hain jam-ba-kaf naghma-e-ku-ku baiThe 

daur hangama-e-gulzar se yaksu baiThe 
tere diwane bhi hain muntazir-e-hu baiThe 

apne parwanon ko phir zauq-e-KHud-afrozi de 
barq-e-derina ko farman-e-jigar-sozi de 

qaum-e-awara inan-tab hai phir su-e-hijaz 
le uDa bulbul-e-be-par ko mazaq-e-parwaz 

muztarib-e-bagh ke har ghunche mein hai bu-e-niyaz 
tu zara chheD to de tishna-e-mizrab hai saz 

naghme betab hain taron se nikalne ke liye 
tur muztar hai usi aag mein jalne ke liye 

mushkilen ummat-e-marhum ki aasan kar de 
mor-e-be-maya ko ham-dosh-e-sulaiman kar de 

jins-e-na-yab-e-mohabbat ko phir arzan kar de 
hind ke dair-nashinon ko musalman kar de 

ju-e-KHun mi chakad az hasrat-e-dairina-e-ma 
mi tapad nala ba-nishtar kada-e-sina-e-ma 

bu-e-gul le gai bairun-e-chaman raaz-e-chaman 
kya qayamat hai ki KHud phul hain ghammaz-e-chaman 

ahd-e-gul KHatm hua TuT gaya saz-e-chaman 
uD gae Daliyon se zamzama-pardaz-e-chaman 

ek bulbul hai ki mahw-e-tarannum ab tak 
us ke sine mein hai naghmon ka talatum ab tak 

qumriyan shaKH-e-sanobar se gurezan bhi huin 
pattiyan phul ki jhaD jhaD ke pareshan bhi huin 

wo purani rawishen bagh ki viran bhi huin 
Daliyan pairahan-e-barg se uryan bhi huin 

qaid-e-mausam se tabiat rahi aazad us ki 
kash gulshan mein samajhta koi fariyaad us ki 

lutf marne mein hai baqi na maza jine mein 
kuchh maza hai to yahi KHun-e-jigar pine mein 

kitne betab hain jauhar mere aaine mein 
kis qadar jalwe taDapte hain mere sine mein 

is gulistan mein magar dekhne wale hi nahin 
dagh jo sine mein rakhte hon wo lale hi nahin 

chaak is bulbul-e-tanha ki nawa se dil hon 
jagne wale isi bang-e-dira se dil hon 

yani phir zinda nae ahd-e-wafa se dil hon 
phir isi baada-e-dairina ke pyase dil hon 

ajami KHum hai to kya mai to hijazi hai meri 
naghma hindi hai to kya lai to hijazi hai meri 



Jawab E Shikwa




dil se jo baat nikalti hai asar rakhti hai 

par nahin taqat-e-parwaz magar rakhti hai 
qudsi-ul-asl hai rifat pe nazar rakhti hai 

KHak se uThti hai gardun pe guzar rakhti hai 
ishq tha fitnagar o sarkash o chaalak mera 

aasman chir gaya nala-e-bebak mera 
pir-e-gardun ne kaha sun ke kahin hai koi 

bole sayyare sar-e-arsh-e-barin hai koi 
chand kahta tha nahin ahl-e-zamin hai koi 

kahkashan kahti thi poshida yahin hai koi 
kuchh jo samjha mere shikwe ko to rizwan samjha 

mujh ko jannat se nikala hua insan samjha 
thi farishton ko bhi hairat ki ye aawaz hai kya 

arsh walon pe bhi khulta nahin ye raaz hai kya 
ta-sar-e-arsh bhi insan ki tag-o-taz hai kya 

aa gai KHak ki chuTki ko bhi parwaz hai kya 
ghafil aadab se sukkan-e-zamin kaise hain 

shoKH o gustaKH ye pasti ke makin kaise hain 
is qadar shoKH ki allah se bhi barham hai 

tha jo masjud-e-malaik ye wahi aadam hai 
aalim-e-kaif hai dana-e-rumuz-e-kam hai 

han magar ijz ke asrar se na-mahram hai 
naz hai taqat-e-guftar pe insanon ko 

baat karne ka saliqa nahin na-danon ko 
aai aawaz gham-angez hai afsana tera 

ashk-e-betab se labrez hai paimana tera 
aasman-gir hua nara-e-mastana tera 

kis qadar shoKH-zaban hai dil-e-diwana tera 
shukr shikwe ko kiya husn-e-ada se tu ne 

ham-suKHan kar diya bandon ko KHuda se tu ne 
hum to mail-ba-karam hain koi sail hi nahin 

rah dikhlaen kise rah-raw-e-manzil hi nahin 
tarbiyat aam to hai jauhar-e-qabil hi nahin 

jis se tamir ho aadam ki ye wo gil hi nahin 
koi qabil ho to hum shan-e-kai dete hain 

DhunDne walon ko duniya bhi nai dete hain 
hath be-zor hain ilhad se dil KHugar hain 

ummati bais-e-ruswai-e-paighambar hain 
but-shikan uTh gae baqi jo rahe but-gar hain 

tha brahim pidar aur pisar aazar hain 
baada-asham nae baada naya KHum bhi nae 

haram-e-kaba naya but bhi nae tum bhi nae 
wo bhi din the ki yahi maya-e-ranai tha 

nazish-e-mausam-e-gul lala-e-sahrai tha 
jo musalman tha allah ka saudai tha 

kabhi mahbub tumhaara yahi harjai tha 
kisi yakjai se ab ahd-e-ghulami kar lo 

millat-e-ahmad-e-mursil ko maqami kar lo 
kis qadar tum pe giran subh ki bedari hai 

hum se kab pyar hai han nind tumhein pyari hai 
tab-e-azad pe qaid-e-ramazan bhaari hai 

tumhin kah do yahi aain-e-wafadari hai 
qaum mazhab se hai mazhab jo nahin tum bhi nahin 

jazb-e-baham jo nahin mahfil-e-anjum bhi nahin 
jin ko aata nahin duniya mein koi fan tum ho 

nahin jis qaum ko parwa-e-nasheman tum ho 
bijliyan jis mein hon aasuda wo KHirman tum ho 

bech khate hain jo aslaf ke madfan tum ho 
ho niko nam jo qabron ki tijarat kar ke 

kya na bechoge jo mil jaen sanam patthar ke 
safha-e-dahr se baatil ko miTaya kis ne 

nau-e-insan ko ghulami se chhuDaya kis ne 
mere kabe ko jabinon se basaya kis ne 

mere quran ko sinon se lagaya kis ne 
the to aaba wo tumhaare hi magar tum kya ho 

hath par hath dhare muntazir-e-farda ho 
kya kaha bahr-e-musalman hai faqat wada-e-hur 

shikwa beja bhi kare koi to lazim hai shuur 
adl hai fatir-e-hasti ka azal se dastur 

muslim aain hua kafir to mile hur o qusur 
tum mein huron ka koi chahne wala hi nahin 

jalwa-e-tur to maujud hai musa hi nahin 
manfat ek hai is qaum ka nuqsan bhi ek 

ek hi sab ka nabi din bhi iman bhi ek
haram-e-pak bhi allah bhi quran bhi ek 

kuchh baDi baat thi hote jo musalman bhi ek 
firqa-bandi hai kahin aur kahin zaten hain 

kya zamane mein panapne ki yahi baaten hain 
kaun hai tarik-e-ain-e-rasul-e-muKHtar 

maslahat waqt ki hai kis ke amal ka mear 
kis ki aankhon mein samaya hai shiar-e-aghyar 

ho gai kis ki nigah tarz-e-salaf se be-zar 
qalb mein soz nahin ruh mein ehsas nahin 

kuchh bhi paigham-e-mohammad ka tumhein pas nahin 
ja ke hote hain masajid mein saf-ara to gharib 

zahmat-e-roza jo karte hain gawara to gharib 
nam leta hai agar koi hamara to gharib 

parda rakhta hai agar koi tumhaara to gharib 
umara nashsha-e-daulat mein hain ghafil hum se 

zinda hai millat-e-baiza ghoraba ke dam se 
waiz-e-qaum ki wo puKHta-KHayali na rahi 

barq-e-tabi na rahi shola-maqali na rahi 
rah gai rasm-e-azan ruh-e-bilali na rahi 

falsafa rah gaya talqin-e-ghazali na rahi 
masjiden marsiyan-KHwan hain ki namazi na rahe 

yani wo sahib-e-ausaf-e-hijazi na rahe 
shor hai ho gae duniya se musalman nabud 

hum ye kahte hain ki the bhi kahin muslim maujud 
waza mein tum ho nasara to tamaddun mein hunud 

ye musalman hain jinhen dekh ke sharmaen yahud 
yun to sayyad bhi ho mirza bhi ho afghan bhi ho 

tum sabhi kuchh ho batao to musalman bhi ho 
dam-e-taqrir thi muslim ki sadaqat bebak 

adl us ka tha qawi laus-e-maraat se pak 
shajar-e-fitrat-e-muslim tha haya se namnak 

tha shujaat mein wo ek hasti-e-fauq-ul-idrak 

KHud-gudazi nam-e-kaifiyat-e-sahba-yash bud 
KHali-az-KHesh shudan surat-e-mina-yash bud 

har musalman rag-e-baatil ke liye nashtar tha 
us ke aaina-e-hasti mein amal jauhar tha 

jo bharosa tha use quwwat-e-bazu par tha 
hai tumhein maut ka Dar us ko KHuda ka Dar tha 

bap ka ilm na beTe ko agar azbar ho 
phir pisar qabil-e-miras-e-pidar kyunkar ho 

har koi mast-e-mai-e-zauq-e-tan-asani hai 
tum musalman ho ye andaz-e-musalmani hai 

haidari faqr hai ne daulat-e-usmani hai 
tum ko aslaf se kya nisbat-e-ruhani hai 

wo zamane mein muazziz the musalman ho kar 
aur tum KHwar hue tarik-e-quran ho kar 

tum ho aapas mein ghazabnak wo aapas mein rahim 
tum KHata-kar o KHata-bin wo KHata-posh o karim 

chahte sab hain ki hon auj-e-surayya pe muqim 
pahle waisa koi paida to kare qalb-e-salim 

taKHt-e-faghfur bhi un ka tha sarir-e-kae bhi 
yun hi baaten hain ki tum mein wo hamiyat hai bhi 

KHud-kushi shewa tumhaara wo ghayur o KHuddar 
tum uKHuwwat se gurezan wo uKHuwwat pe nisar 

tum ho guftar sarapa wo sarapa kirdar 
tum taraste ho kali ko wo gulistan ba-kanar 

ab talak yaad hai qaumon ko hikayat un ki 
naqsh hai safha-e-hasti pe sadaqat un ki 

misl-e-anjum ufuq-e-qaum pe raushan bhi hue 
but-e-hindi ki mohabbat mein birhman bhi hue 

shauq-e-parwaz mein mahjur-e-nasheman bhi hue 
be-amal the hi jawan din se bad-zan bhi hue 

in ko tahzib ne har band se aazad kiya 
la ke kabe se sanam-KHane mein aabaad kiya 

qais zahmat-kash-e-tanhai-e-sahra na rahe 
shahr ki khae hawa baadiya-paima na rahe 

wo to diwana hai basti mein rahe ya na rahe 
ye zaruri hai hijab-e-ruKH-e-laila na rahe 

gila-e-zaur na ho shikwa-e-bedad na ho 
ishq aazad hai kyun husn bhi aazad na ho 

ahd-e-nau barq hai aatish-zan-e-har-KHirman hai 
aiman is se koi sahra na koi gulshan hai 

is nai aag ka aqwam-e-kuhan indhan hai 
millat-e-KHatm-e-rusul shola-ba-pairahan hai 

aaj bhi ho jo brahim ka iman paida 
aag kar sakti hai andaz-e-gulistan paida 

dekh kar rang-e-chaman ho na pareshan mali 
Kaukab-e-ghuncha se shaKHen hain chamakne wali 

KHas o KHashak se hota hai gulistan KHali 
ghul-bar-andaz hai KHun-e-shohda ki lali 

rang gardun ka zara dekh to unnabi hai 
ye nikalte hue suraj ki ufuq-tabi hai 

ummaten gulshan-e-hasti mein samar-chida bhi hain 
aur mahrum-e-samar bhi hain KHizan-dida bhi hain 

saikDon naKHl hain kahida bhi baalida bhi hain 
saikDon batn-e-chaman mein abhi poshida bhi hain 

naKHl-e-islam namuna hai birau-mandi ka 
phal hai ye saikDon sadiyon ki chaman-bandi ka 

pak hai gard-e-watan se sar-e-daman tera 
tu wo yusuf hai ki har misr hai kanan tera 

qafila ho na sakega kabhi viran tera 
ghair yak-bang-e-dara kuchh nahin saman tera 

naKHl-e-shama asti o dar shola do-resha-e-tu 
aaqibat-soz bawad saya-e-andesha-e-tu 

tu na miT jaega iran ke miT jaane se 
nashsha-e-mai ko talluq nahin paimane se 

hai ayan yurish-e-tatar ke afsane se 
pasban mil gae kabe ko sanam-KHane se 

kashti-e-haq ka zamane mein sahaara tu hai 
asr-e-nau-raat hai dhundla sa sitara tu hai 

hai jo hangama bapa yurish-e-bulghaari ka 
ghafilon ke liye paigham hai bedari ka 

tu samajhta hai ye saman hai dil-azari ka 
imtihan hai tere isar ka KHuddari ka 

kyun hirasan hai sahil-e-faras-e-ada se 
nur-e-haq bujh na sakega nafas-e-ada se 

chashm-e-aqwam se maKHfi hai haqiqat teri 
hai abhi mahfil-e-hasti ko zarurat teri 

zinda rakhti hai zamane ko hararat teri 
kaukab-e-qismat-e-imkan hai KHilafat teri 

waqt-e-fursat hai kahan kaam abhi baqi hai 
nur-e-tauhid ka itmam abhi baqi hai 

misl-e-bu qaid hai ghunche mein pareshan ho ja 
raKHt-bar-dosh hawa-e-chamanistan ho ja 

hai tunak-maya tu zarre se bayaban ho ja 
naghma-e-mauj hai hangama-e-tufan ho ja 

quwwat-e-ishq se har past ko baala kar de 
dahr mein ism-e-mohammad se ujala kar de 

ho na ye phul to bulbul ka tarannum bhi na ho 
chaman-e-dahr mein kaliyon ka tabassum bhi na ho 

ye na saqi ho to phir mai bhi na ho KHum bhi na ho 
bazm-e-tauhid bhi duniya mein na ho tum bhi na ho 

KHema-e-aflak ka istada isi nam se hai 
nabz-e-hasti tapish-amada isi nam se hai 

dasht mein daman-e-kohsar mein maidan mein hai 
bahr mein mauj ki aaghosh mein tufan mein hai 

chin ke shahr maraqash ke bayaban mein hai 
aur poshida musalman ke iman mein hai 

chashm-e-aqwam ye nazzara abad tak dekhe 
rifat-e-shan-e-rafana-laka-zikrak dekhe 

mardum-e-chashm-e-zamin yani wo kali duniya 
wo tumhaare shohda palne wali duniya 

garmi-e-mehr ki parwarda hilali duniya 
ishq wale jise kahte hain bilali duniya 

tapish-andoz hai is nam se pare ki tarah 
ghota-zan nur mein hai aankh ke tare ki tarah 

aql hai teri sipar ishq hai shamshir teri 
mere darwesh KHilafat hai jahangir teri 

ma-siwa-allah ke liye aag hai takbir teri 
tu musalman ho to taqdir hai tadbir teri 

ki mohammad se wafa tu ne to hum tere hain 
ye jahan chiz hai kya lauh-o-qalam tere hain


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