300+ Best Selected Dr Rahat Indori Shayari In Hindi

rahat indori shayari


हमारे देश की शान यानि राहत  इन्दोरी साहब की आज में आपके लिए बहुत सारी  शायरी और ग़ज़ल लेकर आया हूँ आप सब लोग जानते ही होगी किन हमारे देश के शायरी राहत इन्दोरी जी कितने पॉपुलर शायर थे इनकी एक एक शायरी बहुत ही जायदा वायरल हुआ करती थी और लोगो उसको काफी जायदा पसंद करते थे कियुकी इनकी ग़ज़ल या शायरी हुआ ही इतनी अछि करती थी | सर राहत इन्दोरी जी के बारे में आप को कुछ बाते बता देता हूँ जिससे आपको हमारा लेख पड़ते हुए मज़ा आये 




राहत इन्दौरी (1 जनवरी 1950 – 11 अगस्त 2020 ( राहत  इन्दोरी जी की मौत कोरोना की वजह से होइ थी डॉक्टरों के दौरों बताया गया रहत इन्दोरी कोरोना पॉजिटिव थे  ) एक भारतीय उर्दू शायर और हिंदी फिल्मों के गीतकार थे।



राहत इंदोरी ने अपने शुरुवाती दिनों में इंद्रकुमार कॉलेज, इंदौर में उर्दू साहित्य का अध्यापन कार्य शुरू किया। आगे चल‌कर उन्होंने मुशायरों पर ध्यान दिया। अपनी प्रतिभा के कारण उन्हें यहां जल्दी ही ख्याति प्राप्त हुई। कुछ ही समय में वें उर्दू साहित्य के प्रसिद्ध शायर बन गए।







मेरे हुजरे में नहीं, और कंही पर रख दो,

आसमां लाए हो, ले आओ, ज़मीन पर रख दो

अरे यार कहां ढूंढने जाओगे हमारे कातिल

आप तो कत्ल का इल्ज़ाम हमी पर रख दो



mere hujare mein nahin, aur kanhee par rakh do,

 aasamaan lae ho, le aao, zameen par rakh do

  are yaar kahaan dhoondhane jaoge hamaare kaatil 

  aap to katl ka ilzaam hamee par rakh do




तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो

मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो



toofaanon se aankh milao, sailaabon par vaar karo

 mallaahon ka chakkar chhodo, tair ke dariya paar karo




उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है

बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूं



us aadamee ko bas ik dhun savaar rahatee hai

 bahut haseen hai duniya ise kharaab karoon




तूफ़ानों से आंख मिलाओ, सैलाबों पे वार करो

मल्लाह का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

फूलों की दुकानें खोलो, ख़ुशबू का व्यापार करो

इश्क़ खता है, तो ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो




toofaanon se aankh milao, sailaabon pe vaar karo 

mallaah ka chakkar chhodo, tair ke dariya paar karo

 phoolon kee dukaanen kholo, khushaboo ka vyaapaar karo 

 ishq khata hai, to ye khata ek baar nahin, sau baar karo




हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते है

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिन्दुस्तान कहते हैं

जो ये दीवार का सुराख है साज़िश है लोगों की,

मगर हम इसको अपने घर का रोशनदान कहते हैं



ham apanee jaan ke dushman ko apanee jaan kahate hai

 mohabbat kee isee mittee ko hindustaan kahate hain 

 jo ye deevaar ka suraakh hai saazish hai logon kee, 

 magar ham isako apane ghar ka roshanadaan kahate hain




कल तक दर दर फिरने वाले,

घर के अंदर बैठे हैं और

बेचारे घर के मालिक, दरवाजे पर बैठे हैं,

खुल जा सिम सिम, याद है किसको,

कौन कहे और कौन सुने?

गूंगे बाहर सीख रहे हैं, बहरे अंदर बैठे हैं




kal tak dar dar phirane vaale,

 ghar ke andar baithe hain aur

  bechaare ghar ke maalik, daravaaje par baithe hain,

   khul ja sim sim, yaad hai kisako,

    kaun kahe aur kaun sune? 

    goonge baahar seekh rahe hain, bahare andar baithe hain





सूरज, सितारे, चाँद मेरे साथ में रहें,

जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहें।


जागने की भी, जगाने की भी, आदत हो जाए,

काश तुझको किसी शायर से मोहब्बत हो जाए।





sooraj, sitaare, chaand mere saath mein rahen,

 jab tak tumhaare haath mere haath mein rahen. 

 

 

 jaagane kee bhee, jagaane kee bhee, aadat ho jae,

  kaash tujhako kisee shaayar se mohabbat ho jae.



Rahat Indori Ghazal


आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो 

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो 


राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें 

रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो 


एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो 

दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो 


आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में 

कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो 


ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे 

नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो 


ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन 

दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो 


ले तो आए शाइरी बाज़ार में 'राहत' मियाँ 

क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो 




aankh mein pani rakho honTon pe chingari rakho 

zinda rahna hai to tarkiben bahut sari rakho 


rah ke patthar se baDh kar kuchh nahin hain manzilen 

raste aawaz dete hain safar jari rakho 


ek hi naddi ke hain ye do kinare dosto 

dostana zindagi se maut se yari rakho 


aate jate pal ye kahte hain hamare kan mein 

kuch ka ailan hone ko hai tayyari rakho 


ye zaruri hai ki aankhon ka bharam qaem rahe 

nind rakho ya na rakho KHwab meyari rakho 


ye hawaen uD na jaen le ke kaghaz ka badan 

dosto mujh par koi patthar zara bhaari rakho 


le to aae shairi bazar mein 'rahat' miyan 

kya zaruri hai ki lahje ko bhi bazari rakho 





रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है 

चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है 


एक दीवाना मुसाफ़िर है मिरी आँखों में 

वक़्त-बे-वक़्त ठहर जाता है चल पड़ता है 


अपनी ताबीर के चक्कर में मिरा जागता ख़्वाब 

रोज़ सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है 


रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं 

रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है 


उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो 

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है 




Rahat indori Urdu shayari



roz taron ko numaish mein KHalal paDta hai 

chand pagal hai andhere mein nikal paDta hai 


ek diwana musafir hai meri aankhon mein 

waqt-be-waqt Thahar jata hai chal paDta hai 


apni tabir ke chakkar mein mera jagta KHwab 

roz suraj ki tarah ghar se nikal paDta hai 


roz patthar ki himayat mein ghazal likhte hain 

roz shishon se koi kaam nikal paDta hai 


us ki yaad aai hai sanso zara aahista chalo 

dhaDkanon se bhi ibaadat mein KHalal paDta hai






कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे 

जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे 


मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का 

इरादा मैं ने किया था कि छोड़ दूँगा उसे 


बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन 

उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे 


पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज 

कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे 


मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को 

समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे 







kahin akele mein mil kar jhinjhoD dunga use 

jahan jahan se wo TuTa hai joD dunga use 


mujhe wo chhoD gaya ye kamal hai us ka 

irada main ne kiya tha ki chhoD dunga use 


badan chura ke wo chalta hai mujh se shisha-badan 

use ye Dar hai ki main toD phoD dunga use 


pasine banTta phirta hai har taraf suraj 

kabhi jo hath laga to nichoD dunga use 


maza chakha ke hi mana hun main bhi duniya ko 

samajh rahi thi ki aise hi chhoD dunga use 




तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के 

दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के 


आते जाते हैं कई रंग मिरे चेहरे पर 

लोग लेते हैं मज़ा ज़िक्र तुम्हारा कर के 


एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे 

वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के 


आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने 

चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के 


मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की 

तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के 


मुंतज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे 

चाँद को छत पुर बुला लूँगा इशारा कर के 



teri har baat mohabbat mein gawara kar ke 

dil ke bazar mein baiThe hain KHasara kar ke 


aate jate hain kai rang mere chehre par 

log lete hain maza zikr tumhaara kar ke 


ek chingari nazar aai thi basti mein use 

wo alag haT gaya aandhi ko ishaara kar ke 


aasmanon ki taraf phenk diya hai main ne 

chand miTTi ke charaghon ko sitara kar ke 


main wo dariya hun ki har bund bhanwar hai jis ki 

tum ne achchha hi kiya mujh se kinara kar ke 


muntazir hun ki sitaron ki zara aankh lage 

chand ko chhat pur bula lunga ishaara kar ke 







बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए

मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए

 

अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में

है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए


दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं

दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए



मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना

तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए



मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब

मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए

 

मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग

मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए

 

मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो

मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए


मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे

मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए

 

सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके

मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए




bimar ko maraz ki dawa deni chahiye 

main pina chahta hun pila deni chahiye 


allah barkaton se nawazega ishq mein 

hai jitni punji pas laga deni chahiye 


dil bhi kisi faqir ke hujre se kam nahin 

duniya yahin pe la ke chhupa deni chahiye 


main KHud bhi karna chahta hun apna samna 

tujh ko bhi ab naqab uTha deni chahiye 


main phul hun to phul ko gul-dan ho nasib 

main aag hun to aag bujha deni chahiye 


main taj hun to taj ko sar par sajaen log 

main KHak hun to KHak uDa deni chahiye 


main jabr hun to jabr ki taid band ho 

main sabr hun to mujh ko dua deni chahiye 


main KHwab hun to KHwab se chaunkaiye mujhe 

main nind hun to nind uDa deni chahiye 


sach baat kaun hai jo sar-e-am kah sake 

main kah raha hun mujh ko saza deni chahiye 





हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते 

जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते 


अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है 

उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते 


अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के 

जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते 


रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना 

हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते 


मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था 

तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते 


मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद 

लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते 


हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे 

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते




hath KHali hain tere shahr se jate jate 

jaan hoti to meri jaan luTate jate 


ab to har hath ka patthar hamein pahchanta hai 

umr guzri hai tere shahr mein aate jate 


ab ke mayus hua yaron ko ruKHsat kar ke 

ja rahe the to koi zaKHm lagate jate 


rengne ki bhi ijazat nahin hum ko warna 

hum jidhar jate nae phul khilate jate 


main to jalte hue sahraon ka ek patthar tha 

tum to dariya the meri pyas bujhate jate 


mujh ko rone ka saliqa bhi nahin hai shayad 

log hanste hain mujhe dekh ke aate jate 


hum se pahle bhi musafir kai guzre honge 

kam se kam rah ke patthar to haTate jate 




अजनबी ख्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

ऐसे जिद्दी हैं परिंदे के उड़ा भी न सकूँ


फूँक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया

ये तेरा खत तो नहीं है कि जला भी न सकूँ


मेरी गैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे

उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ


इक न इक रोज कहीं ढ़ूँढ़ ही लूँगा तुझको

ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ


फल तो सब मेरे दरख्तों के पके हैं लेकिन

इतनी कमजोर हैं शाखें कि हिला भी न सकूँ


मैंने माना कि बहुत सख्त है ग़ालिब कि ज़मीन

क्या मेरे शेर है ऐसे कि सुना भी न सकूं



ajnabi KHwahishen sine mein daba bhi na sakun 

aise ziddi hain parinde ki uDa bhi na sakun 


phunk Dalunga kisi roz main dil ki duniya 

ye tera KHat to nahin hai ki jila bhi na sakun 


meri ghairat bhi koi shai hai ki mahfil mein mujhe 

us ne is tarah bulaya hai ki ja bhi na sakun 


phal to sab mere daraKHton ke pake hain lekin 

itni kamzor hain shaKHen ki hila bhi na sakun 


ek na ek roz kahin DhunD hi lunga tujh ko 

Thokaren zahr nahin hain ki main kha bhi na sakun 



सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए,

ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझको ख़ानदानी चाहिए !


शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं,

शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए !


मैंने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है,

मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए !


मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में,

तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए !


ज़िंदगी है एक सफ़र और ज़िंदगी की राह में,

ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए !


मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया,

एक समुंदर कह रहा था मुझको पानी चाहि



sirf KHanjar hi nahin aankhon mein pani chahiye 

ai KHuda dushman bhi mujh ko KHandani chahiye 


shahr ki sari alif-lailaen buDhi ho chukin 

shahzade ko koi taza kahani chahiye 


main ne ai suraj tujhe puja nahin samjha to hai 

mere hisse mein bhi thoDi dhup aani chahiye 


meri qimat kaun de sakta hai is bazar mein 

tum zuleKHa ho tumhein qimat lagani chahiye 


zindagi hai ek safar aur zindagi ki rah mein 

zindagi bhi aae to Thokar lagani chahiye 


main ne apni KHushk aankhon se lahu chhalka diya 

ek samundar kah raha tha mujh ko pani chahiye 




न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा,

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा !


मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर,

तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा !


इसी गली में वो भूखा फ़क़ीर रहता था,

तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा !


बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन,

जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा !


गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मों हरे-भरे रहना,

जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा



na ham-safar na kisi ham-nashin se niklega 

hamare panw ka kanTa hamin se niklega 


main jaanta tha ki zahrila sanp ban ban kar 

tera KHulus meri aastin se niklega 


isi gali mein wo bhuka faqir rahta tha 

talash kije KHazana yahin se niklega 


buzurg kahte the ek waqt aaega jis din 

jahan pe Dubega suraj wahin se niklega 


guzishta sal ke zaKHmo hare-bhare rahna 

julus ab ke baras bhi yahin se niklega 




घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है 

अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है 


जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो 

इस मुसाफ़िर को तो रस्ते में ठहर जाना है 


मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी उम्रों की पुकार 

मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ कि मर जाना है 


नश्शा ऐसा था कि मय-ख़ाने को दुनिया समझा 

होश आया तो ख़याल आया कि घर जाना है 


मिरे जज़्बे की बड़ी क़द्र है लोगों में मगर 

मेरे जज़्बे को मिरे साथ ही मर जाना है



ghar se ye soch ke nikla hun ki mar jaana hai 

ab koi rah dikha de ki kidhar jaana hai 


jism se sath nibhane ki mat ummid rakho 

is musafir ko to raste mein Thahar jaana hai 


maut lamhe ki sada zindagi umron ki pukar 

main yahi soch ke zinda hun ki mar jaana hai 


nashsha aisa tha ki mai-KHane ko duniya samjha 

hosh aaya to KHayal aaya ki ghar jaana hai 


mere jazbe ki baDi qadr hai logon mein magar 

mere jazbe ko mere sath hi mar jaana hai 




मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं 

मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं 


अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को 

वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं 


मैं आइनों से तो मायूस लौट आया था 

मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं 


वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी 

कहीं कहीं हूँ कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं 


वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है 

उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं 


सितारो आओ मिरी राह में बिखर जाओ 

ये मेरा हुक्म है हालाँकि कुछ नहीं हूँ मैं 


यहीं हुसैन भी गुज़रे यहीं यज़ीद भी था 

हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूँ मैं 


ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएँगी 

मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं 




main lakh kah dun ki aakash hun zamin hun main 

magar use to KHabar hai ki kuchh nahin hun main 


ajib log hain meri talash mein mujh ko 

wahan pe DhunD rahe hain jahan nahin hun main 


main aainon se to mayus lauT aaya tha 

magar kisi ne bataya bahut hasin hun main 


wo zarre zarre mein maujud hai magar main bhi 

kahin kahin hun kahan hun kahin nahin hun main 


wo ek kitab jo mansub tere nam se hai 

usi kitab ke andar kahin kahin hun main 


sitaro aao meri rah mein bikhar jao 

ye mera hukm hai haalanki kuchh nahin hun main 


yahin husain bhi guzre yahin yazid bhi tha 

hazar rang mein Dubi hui zamin hun main 


ye buDhi qabren tumhein kuchh nahin bataengi 

mujhe talash karo dosto yahin hun main 




लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं 

इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं 


मय-कदा ज़र्फ़ के मेआ'र का पैमाना है 

ख़ाली शीशों की तरह लोग उछलते क्यूँ हैं 


मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए 

और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँ हैं 


नींद से मेरा तअल्लुक़ ही नहीं बरसों से 

ख़्वाब आ आ के मिरी छत पे टहलते क्यूँ हैं 


मैं न जुगनू हूँ दिया हूँ न कोई तारा हूँ 

रौशनी वाले मिरे नाम से जलते क्यूँ हैं 



log har moD pe ruk ruk ke sambhalte kyun hain 

itna Darte hain to phir ghar se nikalte kyun hain 


mai-kada zarf ke mear ka paimana hai 

KHali shishon ki tarah log uchhalte kyun hain 


moD hota hai jawani ka sambhalne ke liye 

aur sab log yahin aa ke phisalte kyun hain 


nind se mera talluq hi nahin barson se 

KHwab aa aa ke meri chhat pe Tahalte kyun hain 


main na jugnu hun diya hun na koi tara hun 

raushni wale mere nam se jalte kyun hain 




अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए 

कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए 


सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ 

सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए 


मस्जिद में दूर दूर कोई दूसरा न था 

हम आज अपने आप से मिल-जुल के आ गए 


नींदों से जंग होती रहेगी तमाम उम्र 

आँखों में बंद ख़्वाब अगर खुल के आ गए 


सूरज ने अपनी शक्ल भी देखी थी पहली बार 

आईने को मज़े भी तक़ाबुल के आ गए 


अनजाने साए फिरने लगे हैं इधर उधर 

मौसम हमारे शहर में काबुल के आ गए 




andar ka zahr chum liya dhul ke aa gae 

kitne sharif log the sab khul ke aa gae 


suraj se jang jitne nikle the bewaquf 

sare sipahi mom ke the ghul ke aa gae 


masjid mein dur dur koi dusra na tha 

hum aaj apne aap se mil-jul ke aa gae 


nindon se jang hoti rahegi tamam umr 

aankhon mein band KHwab agar khul ke aa gae 


suraj ne apni shakl bhi dekhi thi pahli bar 

aaine ko maze bhi taqabul ke aa gae 


anjaane sae phirne lage hain idhar udhar 

mausam hamare shahr mein kabul ke aa gae 





दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं 

सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं 


हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे 

हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं 


बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं 

इसी में ख़ुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं 


ये मय-कदा है वो मस्जिद है वो है बुत-ख़ाना 

कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं 


हमारे शहर के मंज़र न देख पाएँगे 

यहाँ के लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं 




dilon mein aag labon par gulab rakhte hain 

sab apne chehron pe dohri naqab rakhte hain 


hamein charagh samajh kar bujha na paoge 

hum apne ghar mein kai aaftab rakhte hain 


bahut se log ki jo harf-ashna bhi nahin 

isi mein KHush hain ki teri kitab rakhte hain 


ye mai-kada hai wo masjid hai wo hai but-KHana 

kahin bhi jao farishte hisab rakhte hain 


hamare shahr ke manzar na dekh paenge 

yahan ke log to aankhon mein KHwab rakhte hain 




दोस्ती जब किसी से की जाए 

दुश्मनों की भी राय ली जाए 


मौत का ज़हर है फ़ज़ाओं में 

अब कहाँ जा के साँस ली जाए 


बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ 

ये नदी कैसे पार की जाए 


अगले वक़्तों के ज़ख़्म भरने लगे 

आज फिर कोई भूल की जाए 


लफ़्ज़ धरती पे सर पटकते हैं 

गुम्बदों में सदा न दी जाए 


कह दो इस अहद के बुज़ुर्गों से 

ज़िंदगी की दुआ न दी जाए 


बोतलें खोल के तो पी बरसों 

आज दिल खोल कर ही पी जाए 




dosti jab kisi se ki jae 

dushmanon ki bhi rae li jae 


maut ka zahr hai fazaon mein 

ab kahan ja ke sans li jae 


bas isi soch mein hun Duba hua 

ye nadi kaise par ki jae 


agle waqton ke zaKHm bharne lage 

aaj phir koi bhul ki jae 


lafz dharti pe sar paTakte hain 

gumbadon mein sada na di jae 


kah do is ahd ke buzurgon se 

zindagi ki dua na di jae 


botalen khol ke to pi barson 

aaj dil khol kar hi pi jae 





काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं 

और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं 


आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत 

हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं 


हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है 

हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं 


देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की 

आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं 


ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने 

बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं 


एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे 

उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं




kaam sab ghair-zaruri hain jo sab karte hain 

aur hum kuchh nahin karte hain ghazab karte hain 


aap ki nazron mein suraj ki hai jitni azmat 

hum charaghon ka bhi utna hi adab karte hain 


hum pe hakim ka koi hukm nahin chalta hai 

hum qalandar hain shahanshah laqab karte hain 


dekhiye jis ko use dhun hai masihai ki 

aaj kal shahr ke bimar matab karte hain 


KHud ko patthar sa bana rakkha hai kuchh logon ne 

bol sakte hain magar baat hi kab karte hain 


ek ek pal ko kitabon ki tarah paDhne lage 

umr bhar jo na kiya hum ne wo ab karte hain 



कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो,

ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो !


जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वजूद,

गली में आग लगी हो तो अपने घर में रहो !


तुम्हें पता ये चले घर की राहतें क्या हैं,

हमारी तरह अगर चार दिन सफ़र में रहो !


है अब ये हाल कि दर दर भटकते फिरते हैं,

ग़मों से मैं ने कहा था कि मेरे घर में रहो !


किसी को ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए,

बुरी हो चाहे भली हो मगर ख़बर में रहो !!





kabhi dimagh kabhi dil kabhi nazar mein raho 

ye sab tumhaare hi ghar hain kisi bhi ghar mein raho 


jala na lo kahin hamdardiyon mein apna wajud 

gali mein aag lagi ho to apne ghar mein raho 


tumhein pata ye chale ghar ki rahaten kya hain 

hamari tarah agar chaar din safar mein raho 


hai ab ye haal ki dar dar bhaTakte phirte hain 

ghamon se main ne kaha tha ki mere ghar mein raho 


kisi ko zaKHm diye hain kisi ko phul diye 

buri ho chahe bhali ho magar KHabar mein raho 





अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ

मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ



मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए

तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ



उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है

बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ



है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की

किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ


मैं करवटों के नए ज़ाइक़े लिखूँ शब-भर

ये इश्क़ है तो कहाँ ज़िंदगी अज़ाब करूँ



ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही

कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ


ab apnī ruuh ke chhāloñ kā kuchh hisāb karūñ 

maiñ chāhtā thā charāġhoñ ko āftāb karūñ 



mujhe butoñ se ijāzat agar kabhī mil jaa.e 

to shahar-bhar ke ḳhudāoñ ko be-naqāb karūñ 


us aadmī ko bas ik dhun savār rahtī hai 

bahut hasīn hai duniyā ise ḳharāb karūñ 


hai mere chāroñ taraf bhiiḌ gūñge bahroñ kī 

kise ḳhatīb banā.ūñ kise ḳhitāb karūñ 


maiñ karvaToñ ke na.e zā.iqe likhūñ shab-bhar 

ye ishq hai to kahāñ zindagī azaab karūñ 


ye zindagī jo mujhe qarz-dār kartī rahī 

kahīñ akele meñ mil jaa.e to hisāb karūñ 




वो एक एक बात पे रोने लगा था,

समुंदर आबरू खोने लगा था !


लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी,

मैं आँखें खोल कर सोने लगा था !


चुराता हूँ अब आँखें आइनों से,

ख़ुदा का सामना होने लगा था !


वो अब आईने धोता फिर रहा है,

उसे चेहरे पे शक होने लगा था !


मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया,

मैं सब के सामने रोने लगा था !!




wo ek ek baat pe rone laga tha 

samundar aabru khone laga tha 


lage rahte the sab darwaze phir bhi 

main aankhen khol kar sone laga tha 


churaata hun ab aankhen aainon se 

KHuda ka samna hone laga tha 


wo ab aaine dhota phir raha hai 

use chehre pe shak hone laga tha 


mujhe ab dekh kar hansti hai duniya 

main sab ke samne rone laga tha 




बुलाती है मगर जाने का नईं

ये दुनिया है इधर जाने का नईं


मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर

मगर हद से गुजर जाने का नईं


सितारें नोच कर ले जाऊँगा

मैं खाली हाथ घर जाने का नईं


वबा फैली हुई है हर तरफ

अभी माहौल मर जाने का नईं


वो गर्दन नापता है नाप ले

मगर जालिम से डर जाने का नईं





bulati hai magar jaane ka nain 

wo duniya hai udhar jaane ka nain 


zamin rakhna paDe sar par to rakkho 

chalo ho to Thahar jaane ka nain 


hai duniya chhoDna manzur lekin 

watan ko chhoD kar jaane ka nain 


janaze hi janaze hain saDak par 

abhi mahaul mar jaane ka nain 


sitare noch kar le jaunga 

main KHali hath ghar jaane ka nain 


mere beTe kisi se ishq kar 

magar had se guzar jaane ka nain 


wo gardan napta hai nap le 

magar zalim se Dar jaane ka nain 



रात की धड़कन जब तक जारी रहती है 

सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है 


जब से तू ने हल्की हल्की बातें कीं 

यार तबीअत भारी भारी रहती है 


पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में 

हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है 


वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं 

जिन लोगों के पास सवारी रहती है 


छत से उस की धूप के नेज़े आते हैं 

जब आँगन में छाँव हमारी रहती है 


घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया 

घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है 


raat ki dhaDkan jab tak jari rahti hai 

sote nahin hum zimmedari rahti hai 


jab se tu ne halki halki baaten kin 

yar tabiat bhaari bhaari rahti hai 


panw kamar tak dhans jate hain dharti mein 

hath pasare jab KHuddari rahti hai 


wo manzil par aksar der se pahunche hain 

jin logon ke pas sawari rahti hai 


chhat se us ki dhup ke neze aate hain 

jab aangan mein chhanw hamari rahti hai 


ghar ke bahar DhunDhta rahta hun duniya 

ghar ke andar duniya-dari rahti hai 



सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा

मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा


मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर

यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा


हज़ार पर्दों में ख़ुद को छुपा के बैठ मगर

तुझे कभी न कभी बे-नक़ाब कर दूँगा


मुझे भरोसा है अपने लहू के क़तरों पर

मैं नेज़े नेज़े को शाख़-ए-गुलाब कर दूँगा


मुझे यक़ीन कि महफ़िल की रौशनी हूँ मैं

उसे ये ख़ौफ़ कि महफ़िल ख़राब कर दूँगा


मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना

मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा


महाजनों से कहो थोड़ा इंतिज़ार करें

शराब-ख़ाने से आ कर हिसाब कर दूँगा




sisaktī rut ko mahaktā gulāb kar dūñgā 

maiñ is bahār meñ sab kā hisāb kar dūñgā 


maiñ intizār meñ huuñ tū koī savāl to kar 

yaqīn rakh maiñ tujhe lā-javāb kar dūñgā 


hazār pardoñ meñ ḳhud ko chhupā ke baiTh magar 

tujhe kabhī na kabhī be-naqāb kar dūñgā 


mujhe bharosa hai apne lahū ke qatroñ par 

maiñ neze neze ko shāḳh-e-gulāb kar dūñgā 


mujhe yaqīn ki mahfil kī raushnī huuñ maiñ 

use ye ḳhauf ki mahfil ḳharāb kar dūñgā 


mujhe gilās ke andar hī qaid rakh varna 

maiñ saare shahr kā paanī sharāb kar dūñgā 


mahājanoñ se kaho thoḌā intizār kareñ 

sharāb-ḳhāne se aa kar hisāb kar dūñgā 



चराग़ों को उछाला जा रहा है

हवा पर रोब डाला जा रहा है


न हार अपनी न अपनी जीत होगी

मगर सिक्का उछाला जा रहा है


वो देखो मय-कदे के रास्ते में

कोई अल्लाह-वाला जा रहा है


थे पहले ही कई साँप आस्तीं में

अब इक बिच्छू भी पाला जा रहा है


मिरे झूटे गिलासों की छका कर

बहकतों को सँभाला जा रहा है


हमी बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन

हमें घर से निकाला जा रहा है


जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो

मोहब्बत करने वाला जा रहा है




charāġhoñ ko uchhālā jā rahā hai 

havā par ro.ab Daalā jā rahā hai 


na haar apnī na apnī jiit hogī 

magar sikka uchhālā jā rahā hai 


vo dekho mai-kade ke rāste meñ 

koī allāh-vālā jā rahā hai 


the pahle hī ka.ī saañp āstīñ meñ 

ab ik bichchhū bhī paalā jā rahā hai 


mire jhūTe gilāsoñ kī chhakā kar 

bahaktoñ ko sambhālā jā rahā hai 


hamī buniyād kā patthar haiñ lekin 

hameñ ghar se nikālā jā rahā hai 


janāze par mire likh denā yaaro 

mohabbat karne vaalā jā rahā hai 



ये सर्द रातें भी बन कर अभी धुआँ उड़ जाएँ

वो इक लिहाफ़ मैं ओढूँ तो सर्दियाँ उड़ जाएँ



ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है

हैं उतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ


ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है

बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ




बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की

ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ


रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़* हैं हम लोग

अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ



हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से

सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ


बहुत ग़ुरूर* है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ



मज्ज़ूब-ए-इश्क़ – प्यार से भरे हुए

ग़ुरूर – घमंड



ye sard rāteñ bhī ban kar abhī dhuāñ uḌ jaa.eñ 

vo ik lihāf maiñ oḌhūñ to sardiyāñ uḌ jaa.eñ 


ḳhudā kā shukr ki merā makāñ salāmat hai 

haiñ utnī tez havā.eñ ki bastiyāñ uḌ jaa.eñ 


zamīñ se ek ta.alluq ne bāñdh rakkhā hai 

badan meñ ḳhuun nahīñ ho to haDDiyāñ uḌ jaa.eñ 


bikhar bikhar sī ga.ī hai kitāb sāñsoñ kī 

ye kāġhzāt ḳhudā jaane kab kahāñ uḌ jaa.eñ 


rahe ḳhayāl ki majzūb-e-ishq haiñ ham log 

agar zamīn se phūñkeñ to āsmāñ uḌ jaa.eñ 


havā.eñ baaz kahāñ aatī haiñ sharārat se 

saroñ pe haath na rakkheñ to pagḌiyāñ uḌ jaa.eñ 


bahut ġhurūr hai dariyā ko apne hone par 

jo merī pyaas se uljhe to dhajjiyāñ uḌ jaa.eñ 




हौसले ज़िंदगी के देखते हैं

चलिए! कुछ रोज़ जी के देखते हैं


नींद पिछली सदी से ज़ख़्मी है

ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं


रोज़ हम एक अंधेरी धुँध के पार

काफ़िले रौशनी के देखते हैं


धूप इतनी कराहती क्यों है

छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं


टकटकी बाँध ली है आँखों ने

रास्ते वापसी के देखते हैं


बारिशों से तो प्यास बुझती नहीं

आइए ज़हर पी के देखते हैं



hausle zindagi ke dekhte hain 

chaliye kuchh roz ji ke dekhte hain 


nind pichhli sadi ki zaKHmi hai 

KHwab agli sadi ke dekhte hain 


rose hum ek andheri dhund ke par 

qafile raushni ke dekhte hain 


dhup itni karahti kyun hai 

chhanw ke zaKHm si ke dekhte hain 


TukTuki bandh li hai aankhon ne 

raste wapsi ke dekhte hain 


paniyon se to pyas bujhti nahin 

aaiye zahr pi ke dekhte hain 





बैठे बैठे कोई ख़याल आया

ज़िंदा रहने का फिर सवाल आया


कौन दरियाओं का हिसाब रखे

नेकियाँ नेकियों में डाल आया


ज़िंदगी किस तरह गुज़ारते हैं

ज़िंदगी भर न ये कमाल आया


झूट बोला है कोई आईना

वर्ना पत्थर में कैसे बाल आया


वो जो दो-गज़ ज़मीं थी मेरे नाम

आसमाँ की तरफ़ उछाल आया


क्यूँ ये सैलाब सा है आँखों में

मुस्कुराए थे हम-ख़याल आया



baiThe baiThe koī ḳhayāl aayā 

zinda rahne kā phir savāl aayā 


kaun dariyāoñ kā hisāb rakhe 

nekiyāñ nekiyoñ meñ Daal aayā 


zindagī kis tarah guzārte haiñ 

zindagī bhar na ye kamāl aayā 


jhuuT bolā hai koī ā.īna 

varna patthar meñ kaise baal aayā 


vo jo do-gaz zamīñ thī mere naam 

āsmāñ kī taraf uchhāl aayā 


kyuuñ ye sailāb sā hai āñkhoñ meñ 

muskurā.e the ham-ḳhayāl aayā 



अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे 

चराग़ हाथ उठा कर दुआएँ करने लगे 


तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर 

ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे 


लहू-लुहान पड़ा था ज़मीं पर इक सूरज 

परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे 


ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू 

बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे 


झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले 

वो धूप है कि शजर इल्तिजाएँ करने लगे 


अजीब रंग था मज्लिस का ख़ूब महफ़िल थी 

सफ़ेद पोश उठे काएँ काएँ करने लगे 




andhere chaaron taraf saen saen karne lage 

charagh hath uTha kar duaen karne lage 


taraqqi kar gae bimariyon ke saudagar 

ye sab mariz hain jo ab dawaen karne lage 


lahu-luhan paDa tha zamin par ek suraj 

parinde apne paron se hawaen karne lage 


zamin par aa gae aankhon se TuT kar aansu 

buri KHabar hai farishte KHataen karne lage 


jhulas rahe hain yahan chhanw banTne wale 

wo dhup hai ki shajar iltijaen karne lage 


ajib rang tha majlis ka KHub mahfil thi 

safed posh uThe kaen kaen karne lage  

Please don't spam
Thank you for your feedback

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post